बांस के जंगल में बांसुरी

बांस के जंगल में बांसुरी

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तिब्बती बाजार की चढ़ाई चढ़ते हुए पिया ने देखा दुकानें खुलने लगी थीं। रंगीन मनकों … नगों और कपड़े पर बने भगवान बुद्ध के चित्रों की दुकानें। हवा में नमी थी …पूरे आकाश में बादल यहां-वहां फैल गए थे। सोचा था पूरा एक दिन देवदार के जंगलों में गुजारेगी, पर शाम को गंधर्व का फोन आ गया था। बारिश के पानी से सड़क धुली-धुली सी निखर गई थी।


लड़कियों का एक झुंड खिलखिलाता हुआ एक दूसरे को कोहनियां मारता हुआ उसके सामने से निकल गया। वह चुप है …आत्मकेंद्रित और अब उसी बाजार के एक छोटे से रेस्टोरेंट में गंधर्व का इंतजार कर रही है। ऐसा इंतजार जिसका उसके लिए कोई अर्थ नहीं। सोच लिया था कि उसे क्या कहना है। वह उससे मिलने को मना भी कर सकती थी, पर आगे वह कोई खुशफहमी न पाले इसलिए उसने हां कर दी थी। अचानक ही जैसे उसके आसपास की भीड़ उसके जेहन से गायब हो गई।

एक अजीब सा पकड़ में न आने वाला सन्नाटा। उसे लगा कि वह उस नामालूम से रेस्टोरेंट में चाय का कप सामने रखे हुए अकेली बैठी हुई है। कहीं कोई नहीं …रेस्टोरेंट का मालिक भी नहीं, हालांकि वह उसके सामने ही चाय बना रहा था। अक्सर उसके साथ ऐसा ही हुआ है। भीड़ से घबराकर वह एकांत में चली जाती है, पर वहां के सन्नाटे से ही उसका दम घुटने लगता है। कितने साल गुजर गए वह भर नींद नहीं सोई। जागती आंखों से कितनी रातें गुजर गई हैं कोई हिसाब नहीं अब नींद आ तो जाती है, पर कितने घंटे की, पता नहीं चलता।

पिया ने चाय के पैसे दिए और बाहर निकल आई। चलते-चलते वह ठिठक गई जाने क्यों लगा कि वह पीछे मुड़ेगी तो गंधर्व दिख जाएगा। वही शर्मीली हंसी…और अपने आने की वजह को नकारता हुआ। गंधर्व से उसकी पहचान पंद्रह वर्ष पुरानी थी। इन बीते वर्षों में वह उसे टुकड़ों-टुकड़ों में याद आया है। यादें भी ऐसी जिनमें न तो इतनी तपिश थी कि जीना मुहाल हो जाए और न ही वह उसे पूरी तरह भूल पाई। हमें जैसे पुरानी चीजें संभाल कर रखने की आदत-सी होती है इसलिए…हम अच्छा-बुरा सब संभाल कर रखते जाते हैं। ऐसा प्यार भी जिसे आप जानते हैं कि वह अब आपकी जिंदगी में नहीं रहा, पर मन है कि सबकुछ संभाले रहता है पनडोरा बॉक्स की तरह।

पिया की जिंदगी में उसका सोलहवां साल एक तिलिस्म की तरह आया। सपनों जैसी उम्र.. दोस्तों  का साथ, खिलखिलाहटें… कहानियां  कविताएं। कविताएं पढ़ती ही पिया अनंत की फैन हो गई। वह कौन था उसे नहीं पता था पर उसकी एक कविता उसे बहुत पसंद थी।

जब भी चलती है तेज हवा जंगल में 

बांस के जंगल में बांसुरी सी बजती है

कुछ ऐसी दीवानी हुई वह कि अनंत की कविताएं जब भी पढ़ती उसे लंबे खत लिखती। वह कभी जवाब देता कभी न देता और कभी तो बल्कुल ही भूल जाता । फिर एकदिन उसका खत लौट आया …उसपर लिखा था कि प्राप्तकर्ता शहर छोड़कर जा चुका है।

अनंत कहां चला गया था कुछ पता नहीं था पर पिया के मन में जो प्यार की नन्हीं कोंपल उगी थी वह दम तोड़ गई। जिंदगी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ती रही पर अनंत उसकी स्मृतियों में हमेशा बना रहा एक हल्की सी टीस बनकर।

गंधर्व से उसकी मुलाकात एक सम्मान समारोह में हुई। वह एक बड़ा सा हॉल था। एक-एक सम्मान ग्रहण करते लोगों को देख वह चकित थी। कितने ही ऐसे लोग जिन्हें उसने कभी देखा ही नहीं था …सिर्फ पढ़ा था, उसके सामने थे। उसके साथ महाराष्ट्र से आई एक लेखिका बैठी थीं , जो लगातार बातें करती जा रही थीं तभी कोई उसके बगल में आकर बैठ गया।

थोड़ी देर बाद स्टेज पर गंधर्व का नाम पुकारा गया। वह स्टेज की ओर देखने लगी। यह नाम उसके सहयोगियों के बीच काफी चर्चित था और साहित्य के क्षेत्र में भी स्थापित माना जाता था। अचानक उसके पास बैठा हुआ व्यक्ति उठा और स्टेज पर चला गया। तालियों के बीच सम्मान ग्रहण करते गंधर्व को वह अपलक देखती रह गई। बाद में वह उसके पास आकर बैठ गया। पिया ने उसे मुबारकबाद दी। अच्छा लगा था उसे, जो सबकी निगाहों का केंद्र था वह उसके पास बैठा था। उसने उसे ध्यान से देखा। यही कोई तीस साल की उम्र … स्वागत के समय उसके माथे पर लगाई गई रोली और अक्षत अभी भी वैसे ही थे। ब्लैक सूट में वह काफी आकर्षक लग रहा था। लंच के वक्त तक दोनों साथ ही रहे।

वह जाड़ों की शाम थी अंधेरा जल्दी ही घिर आया था। हल्की बारिश के शुरू होते ही लोग धीरे-धीरे खिसकने लगे। औपचारिकता वश वह उसे घर तक छोड़ने चला आया। गाड़ी ड्राइव करने से पहले वह मुड़ा था।

-आपका नाम जान सकता हूं।

-पिया…वह मुस्कुराई…थी

-मैं गंधर्व।

-जानती हूं … उसे हंसी आ गई।

-अब इतना सुंदर तो नहीं हूं पर न जाने क्यों मेरी मां को यही नाम पसंद आया।

-फिलहाल इतने बुरे भी नहीं लगते … उसके स्वर में शोखी आ समाई।

-जर्रानवाजी है आपकी, उसने हंस कर कहा और सामने देखने लगा। बारिश अब भी वैसी ही थी। उसके घर के सामने गाड़ी रोक कर खुद भी बाहर निकल आया। घर के बाहर लगी लाइट की रोशनी सीधे उसके माथे पर पड़ रही थी और बारिश की बूंदें फिसलती हुई चेहरे तक आ गई थीं।

-आप क्यों भीग रहे हैं आइए घर में कॉफी पीकर चले जाइएगा। तब तक बारिश काफी थम गई थी।

-ओह नो, मैं चलूंगा … मुझे एक मीटिंग में जाना है। कहकर वह गाड़ी में बैठ गया।

काफी दिन गुजर गए वह कुछ-कुछ उसे भूल भी चुकी थी, जब अचानक ही वह उसे किताबों की दुकान पर मिल गया। किताबें हाथों में थामे व्यस्त सा निकला ही था कि उसे देख कर रुक गया।

-पिया आपके घर में कौन-कौन है ? साथ-साथ चलते हुए उसने पूछा।

-मां और मैं …पापा तीन साल हुए नहीं रहे।

-मेरे घर मां-पापा और एक छोटी बहन है मौलश्री। बैंक में काम करता हूं, पर लिखने का समय निकाल ही लेता हूं। शादी इसलिए नहीं की, क्योंकि मैं बंधन में नहीं बंधना चाहता। वैसे भी लड़कियों की फितरत अजीब सी लगती है मुझे।

-ऐसा भी क्या…पिया उसकी ओर देखने लगी।

-पहले मैं अनंत नाम से लिखा करता था … इतनी लड़कियां फैन हो गईं कि मेरी निजी जिंदगी ही डिस्टर्ब होकर रह गई। एक सिरफिरी लड़की तो रोज मुझे खत लिखने लगी थी। मैं तंग आ गया था निकी नाम की उस लड़की से। फिर मैंने वह नाम खत्म कर दिया और अपने असली नाम से लिखने लगा।

 पिया का चेहरा स्याह हो गया। वे जहां खड़े थे वहां से उनके रास्ते अलग होते थे। हालांकि गंधर्व से उसकी यह दूसरी ही मुलाकात थी पर उसने तय कर लिया कि जो उसे कहना है अभी कहेगी। उसका चेहरा अंधेरे में था, पर गंधर्व के चेहरे पर सीधी रोशनी पड़ रही थी।

-गंधर्व…. उसने ठहरी हुई आवाज में कहा- वह सिरफिरी लड़की मैं ही थी। निकी मेरा घर का नाम है और वे लंबे खत मैं ही तुम्हें लिखा करती थी। मुझे तुम्हारी वह कविता “बांस के जंगल” में बेहद पसंद थी, पर आज मैं अपने किए पर शर्मिंदा हूं और तुम्हें अनावश्यक रूप से तंग करने के लिए माफी चाहती हूं। कहकर पिया मुड़ गई। गंधर्व जैसे सन्नाटे में था … सड़क जहां से मुड़ती थी वहां पहुंच कर पिया ने एक उड़ती नजर उस पर डाली … वह वहीं था …

                                                                                                                                                                      -प्रिया आनंद

सहेलियां…एक छोटी सी मुलाकात

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