कोतवाल साहिब

कोतवाल साहिब

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अयोध्या में मणि पर्वत के पास एक काफी लंबा-चौड़ा कब्रिस्तान है। इसमें जाने कितनी पुरानी और अति पुरानी कब्रें हैं। इसी के आसपास एक चारदीवारी से घिरी जगह भी है जिसमें कई कब्रें हैं जिनका आकार काफी बड़ा है इन्हें अत्यंत आदर और सम्मान प्राप्त है। यहां जाति और समुदाय का भेद नहीं है तथा हर वर्ग के लोग माथा टेकने आते हैं। पेड़ों और कंटीली झाडिय़ों से घिरा हुआ कब्रिस्तान काफी पुराना है। कहते हैं इस पूरे कब्रिस्तान की देखभाल कोतवाल साहिब के संरक्षण में है। वही इस कब्रिस्तान के अधिकारी हैं। कोतवाल साहिब से जुड़ी ऐसी जाने कितनी कहानियां थीं जिन्हें मैं बचपन से सुनती आई थी। कहना न होगा कि पारलौकिक और अशरीरी आत्माओं से मुझे भय भी लगता था और उनके प्रति गहन जिज्ञासा भी थी।
एक दिन हमारे ही इक्के वाले ने बताया कि उसने कोतवाल साहिब को देखा है। उसने बताया-उस रात मुझे फैजाबाद से लौटने में देर हो गई थी ज्यादा पैसे की लालच में एक सवारी को रेलवे स्टेशन छोडऩे चला गया। लौटा तो काफी देर हो चुकी थी। चांदनी रात थी इसलिए वक्त का पता नहीं चल सका। हवा के हल्के झोंके के साथ घोड़ा अपनी मस्त चाल में चला जा रहा था। उसी मस्ती में मैं भी गुनगुनाने लगा। रानोपाली से आगे कब्रिस्तान के बगल से गुजरते हुए किसी ने बड़ी कड़क आवाज में मुझे रुकने को कहा और मैं ठिठक गया। घोड़े की रास खींच कर मैंने उसे रोक लिया।
-सलाम हुजूर… क्या मुझसे कोई गलती हो गई? कहते हुए मैं इक्के से नीचे उतर आया। अब मेरी नजर सामने गई। सफेद कपड़ों में वह शख्स एक कद्दावर सफेद घोड़े पर सवार था। सफेद दाढ़ी और रुआबदार चेहरा। उन्हें देख कर मैं सहम गया।
-देखते नहीं वक्त कितना हो रहा है ? यह वक्त रूहों के जागने का है तुम ऐसे में यहां क्यों आए?
-गलती हो गई हुजूर वक्त का पता ही नहीं चला।
-आगे से याद रखना… बारह बजे के बाद इस तरफ नहीं आना।
-पक्का नहीं आऊंगा, पर आप…?
मैं इस कब्रिस्तान का कोतवाल हूं। कह कर कोतवाल साहिब ने घोड़े को एड़ लगाई और आगे बढ़ गए।
इक्के वाले के होश उड़ गए। वह घर तक चला तो आया पर जैसे अपने होश में नहीं था। एक हफ्ते तक वह बुखार में पड़ा रहा। ठीक होने के बाद भी उसे उस तरफ जाने की हिम्मत नहीं हुई। इस बात को काफी अर्सा हुआ इक्के वाला अब नहीं है। हां, कोतवाल साहिब की बड़ी सी कब्र आज भी उसी कब्रिस्तान के बीच है। इसके ऊपर एक विशाल पेड़ की छाया है।


ghost-FORTठीक ऐसी ही एक और कहानी इस शख्सियत से जुड़ी हुई है। यह साठ के दशक की बात है जब अचानक ही अयोध्या का पुलिस विभाग जुआरियों को पकडऩे में सक्रिय हो गया। जुआरियों ने इनसे बचने के लिए और दूसरे ठिकाने ढूंढ लिए। ऐसी ही एक रेलवे की पुलिया पर जंगली घास से घिरी जगह में चार जुआरी खेल रहे थे। शाम का वक्त था, अचानक पुलिस की दबिश हुई और चारों अपनी जान लेकर भागे। एक पुलिया के नीचे बह रहे पानी में कूद पड़ा, दूसरा भाग कर अरहर के खेतों में छिप गया, तीसरा जंगल में जा कर छिप गया और चौथा सीधे रास्ते की ओर भागा। वह कब्रिस्तान में जाकर उसी पेड़ पर चढ़ गया जो कोतवाल साहिब की कब्र पर छाया किए हुए था। वहीं बैठे उसे नींद आ गई। आधी रात के बाद उसकी नींद खुली तो वह हैरान रह गया। नीचे पूरे कब्रिस्तान में मीना बाजार लगा हुआ था। मशालों की रोशनियों में दुकानें चमक रही थीं। रेशमी कपड़े पहने औरतें … नवाबी शान से टहलते अमीर..और कचौरियों जलेबियों की खुशबू। वह अभी संभल भी न पाया था कि किसी ने उसकी तरफ इशारा कर कहा..वह रहा।
उसे लगा पुलिस फिर आ गई। डर से वह और ऊपर चढ़ता गया।
-उसे मत तंग करो वह डर गया है गिर जाएगा… किसी ने कहा।
उसने नीचे देखा तो कोतवाल साहिब थे…सफेद घोड़े पर सवार अपनी उसी रुआबदार शख्सियत के साथ। उनके होंठों पर मुस्कुराहट थी। उसने हाथ जोड़ दिए और कोतवाल साहिब का काफिला आगे बढ़ गया।
कहा जाता है कि कोतवाल साहिब उन्नीसवीं सदी में यहां अंग्रेजों के खिलाफ सक्रिय क्रांतिकारियों के साथ थे और बगावत के लिए जो हथियार इकट्ठे किए जाते थे उनकी देखरेख का जिम्मा उन्हीं का था। वह मुस्लिम थे पर कहां से आए थे किसी को पता नहीं, पर तब तो पूरा भारत एक था और क्रांति में भी हिंदू मुस्लिम साथ थे। उनके निधन के बाद भी ये कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहीं। पता नहीं इसके बाद उन्हें इस तरह देखने वालों ने सचमुच उन्हें देखा था या फिर उनके मस्तिष्क ने उन्हें देखने की कल्पना कर ली थी, पर यह सच है कि आज भी कोतवाल साहिब का दबदबा कायम है और उधर से जाने वाले अदब से उनकी कब्र पर बिना माथा टेके नहीं जाते।
-सुनीता तिवारी

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