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कृष्ण और कर्ण : कितने समान और कितने अलग

कृष्ण और कर्ण : कितने समान और कितने अलग

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lord krishna and karan: श्री कृष्ण और कर्ण महाभारत के दो प्रमुख महानायक थे, पर विषमता अपनी जगह थी। एक कर्ण था तो दूसरा कर्णधार। पहला महाभारत युद्ध का पुरोधा तो दूसरा इसी युद्ध का योद्धा। दोनों में जमीन-आसमान का अंतर था। इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि इन दोनों के बीच कुछ ऐसी समानताएं भी थीं जिससे दोनों एक-दूसरे के पूरक जान पड़ते हैं। कर्ण का जन्म को एक विलक्षण एवं असाधारण घटना ही कहा जा सकता है। कुंती के सेवा भाव से प्रसन्न होकर दुर्वासा ऋषि ने उसे एक महा मंत्र दिया जिसके प्रभाव से वह किसी भी देवता का आवाहन कर बुला सकती थीं।

मंत्र की सत्यता को परखने के लिए कुंती ने सूर्य का आवाहन किया और कुंती के न चाहते हुए भी उन्हें दिव्य और विलक्षण पुत्र का वरदान दिया। कर्ण का जन्म आधी रात को हुआ उस समय घनघोर वर्षा हो रही थी, बिजलियां चमक रही थीं। यही कारण था कि कुंती और उनकी दासी को छोड़कर अन्य किसी को कर्ण के जन्म लेने का संकेत तक नहीं मिल सका। कृष्ण के जन्म पर माता देवकी को एक साथ हर्ष, दुःख और भय की अनुभूति हुई थी। यही स्थिति कुंती के सामने भी थी दिव्य पुत्र देख कर उन्हें भी हर्ष हुआ था लोक-लाज का उन्हें भय था और भय से बचने के लिए गंगा में कर्ण को प्रवाहित करने का उन्हें दुःख भी था।


दोनों को ही जन्म के साथ ही अपनी मां से दूर होना पड़ा और दोनों को ही भारत की दो महान नदियों का संसर्ग मिला। कृष्ण के मार्ग में यमुना आईं तो कर्ण को मां गंगा का पुनीत प्रवाह मिला था। दोनों ही अपने वंश से भिन्न वंश में पले बढ़े। कृष्ण को यादव वंश का आश्रय मिला तो कर्ण को सूत का घर।कर्ण और कृष्ण दोनों को कमोवेश घोर अपमान का सामना करना पड़ा था। भरे समाज में शिशुपाल सौ बार अपमान जनक शब्दों का प्रयोग कर उन्हें अपमानित किया था इसी प्रकार कर्ण को भी पांडवों ने कई बार अपमानित किया। इंद्रप्रस्थ में आयोजित एक उत्सव में पांडवों ने कृष्ण सहित कौरवों को भी आमंत्रित किया था।

कर्ण को यह आमंत्रण नहीं मिला था पर वह मात्र कृष्ण से मिलने वहां पहुंच गया था। महल के अंदर दृष्टिभ्रम से जब दुर्योधन लड़खड़ा कर गिरा तो उसका मुकुट पानी के हौज में जा गिरा। दुर्योधन को बिना मुकुट देख कर कर्ण ने अपना मुकुट उसे दे दिया और स्वयं बाहर जाने लगा क्योंकि उस सभा में सिर्फ मुकुटधारी ही रह सकते थे। कृष्ण ने कर्ण को बुलाया और अपने पास बिठा लिया। कृष्ण मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थे इसलिए कोई कुछ बोल नहीं सकता था परंतु शिशुपाल ने कृष्ण का अपमान करना शुरू कर दिया। अपमान के सौ शब्द पूरे श्रीकृष्ण ने अपना सुदर्शनचक्र शिशुपाल पर छोड़ दिया।

शिशुपाल ने वहां बैठे सभी लोगों से दुहाई दी पर कोई उसे बचाने नहीं आया। उस चक्र के तीक्ष्ण तेज और भीषण गर्मी को कोई झेल नहीं पा रहा था तब वह भागकर कर्ण के सिंहासन के नीचे जा बैठा। सुदर्शनचक्र कर्ण के सामने आकर रुक गया। कर्ण सामान्य रूप से वहां बैठा रहा मानो उसके लिए चक्र शीतल पड़ गया हो। तभी श्रीकृष्ण ने कर्ण को इशारा किया कि इसका अंतिम समय आ गया है, वहां से हट जाए। कर्ण हट गया और शिशुपाल मारा गया। इससे सिद्ध हो गया कि कर्ण में सुदर्शनचक्र को रोकने की शक्ति थी। इंद्रप्रस्थ से जब कर्ण लौटा तो उसने दर्पण में देखा तो उसके सिर पर ठीक वैसा ही मुकुट था जैसा श्रीकृष्ण का था। कृष्ण ने सिद्ध कर दिया था कि उनमें और कृष्ण में कोई अंतर नहीं हैं।

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