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नृसिंह अवतार में आए भगवान विष्णु

नृसिंह अवतार में आए भगवान विष्णु

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Narasimha: कथा पौराणिक है पर विष्णु के अवतार से जुड़ी है एक ऐसा अवतार जिनका आधा शरीर मनुष्य का और आधा शरीर सिंह का है, परंतु विष्णु को यह रूप क्यों धारण करना पड़ा? वास्तव में पृथ्वी के उद्धार के समय भगवान ने वाराह अवतार धारण करके हिरण्याक्ष का वध किया। इससे उसका बड़ा भाई हिरण्यकश्यपु बड़ा रुष्ट हुआ। उसने अजेय होने का संकल्प किया। सहस्त्रों वर्ष बिना जल के वह सर्वथा स्थिर होकर तप करता रहा। ब्रह्मा जी से उसे अजेय होने का वरदान मिला। उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। लोकपालों को मार भगा दिया। स्वत: सम्पूर्ण लोकों का अधिपति हो गया। अब सभी देवता असहाय थे क्योंकि इस असुर को वे किसी प्रकार पराजित नहीं कर सकते थे। परंतु यह महान दैत्य अपने ही पुत्र से हार गया।


‘बेटा, तुझे क्या अच्छा लगता है?’ हिरण्यकश्यपु ने एक दिन सहज ही अपने चारों पुत्रों में सबसे छोटे प्रह्लाद से पूछा।
‘इन मिथ्या भोगों को छोड़कर वन में श्री हरि का भजन करना!’ बालक प्रह्लाद का उत्तर स्पष्ट था।
‘इसे आप लोग ठीक-ठीक शिक्षा दें!’ दैत्यराज ने पुत्र को आचार्य शुक्र के पुत्र षण्ड तथा अमर्क के पास भेज दिया। दोनों गुरुओं ने प्रयत्न किया। प्रतिभाशाली बालक ने अर्थ, धर्म, काम की शिक्षा पूर्ण रूप से प्राप्त की परंतु जब पुन: पिता ने उससे पूछा तो उसने भक्ति को ही श्रेष्ठ बताया।

‘इसे मार डालो। यह मेरे शत्रु का पक्षपाती है।’ क्रोधित दैत्यराज ने आज्ञा दी। असुरों ने आघात किया। भाले की नोक मुड़ गई, खडग टूट गया, त्रिशूल टेढ़े हो गए पर वह कोमल शिशु अक्षत रहा। दैत्य चौंका। प्रह्लाद को विष दिया गया पर वह जैसे अमृत हो। सर्प छोड़े गए उनके पास और वे फन उठाकर झूमने लगे। मत्त गजराज ने उठाकर उन्हें मस्तक पर रख लिया। पर्वत से नीचे फेंकने पर वे ऐसे उठ खड़े हुए, जैसे शय्या से उठे हों। समुद्र में पाषाण बांधकर डुबाने पर दो क्षण पश्चात ऊपर आ गये। घोर चिता में उनको लपटें शीतल प्रतीत हुई।
‘तू किस के बल से मेरे अनादर पर तुला है?’ हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को बांध दिया और स्वयं खड्ग उठाया।
‘जिसका बल आप में तथा समस्त चराचर में है!’ प्रह्लाद निर्भय थे।
‘कहां है वह?’
‘मुझमें, आप में, खड्ग में, सर्वत्र!’
– इस स्तम्भ में भी?’

‘निश्चय!’ प्रह्लाद के वाक्य के साथ दैत्य ने खंभे पर घूसा मारा। वह और समस्त लोग चौंक गये। स्तंभ से बड़ी भयंकर गर्जना का शब्द हुआ। एक ही क्षण पश्चात दैत्य ने देखा- समस्त शरीर मनुष्य का और मुख सिंह का, बड़े-बड़े नख एवं दांत, प्रज्वलित नेत्र, स्वर्णिम जटाएं वाली भीषण आकृति खंभे से प्रकट हुई। दैत्य के अनुचर झपटे और मारे गये अथवा भाग गये। हिरण्यकशिपु को भगवान नृसिंह ने पकड़ लिया।

‘मुझे ब्रह्माजी ने वरदान दिया है!’ छटपटाते हुए दैत्य चिल्लाया। ‘दिन में या रात में न मरूंगा कोई देव, दैत्य, मानव, पशु मुझे न मार सकेगा। भवन में या बाहर मेरी मृत्यु न होगी। समस्त शस्त्र मुझ पर व्यर्थ सिद्ध होंगे। भूमि, जल, गगन-सर्वत्र मैं अवध्य हूं।’
नृसिंह बोले- ‘यह संध्याकाल है। मुझे देख कि मैं कौन हूं। यह द्वार की देहली, ये मेरे नख और यह मेरी जंघा पर पड़ा तू।’ अट्टहास करके भगवान ने नखों से उसके वक्ष को विदीर्ण कर डाला।
वह उग्ररूप देखकर देवता डर गए, ब्रह्मा जी अवसन्न हो गए, महालक्ष्मी दूर से लौट आईं पर प्रह्लाद-वे तो प्रभु के वर प्राप्त पुत्र थे। उन्होंने स्तुति की। भगवान नृसिंह ने गोद में उठा कर उन्हें बैठा लिया और अभयदान दिया।

अजर, अमर, अविनाशी भगवान परशुराम

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