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सूर्य अंतर्यामी होने के कारण सबके प्रेरक

सूर्य अंतर्यामी होने के कारण सबके प्रेरक

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भगवान सूर्य जीवन मात्र के लिए प्रत्यक्षगोचर हैं इसलिए देव मंडल में इनका अन्यतम और विशिष्ट स्थान है। ऋग्वेद में कहा गया है।


चित्रं देवानामुद्गादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्ने:
आप्रा द्यावापृथिवी अंतरिक्ष: सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च
सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मत्र्यो न योषामभ्येति पश्चात
यात्रा नरो देवयंतो युगानि वितन्वते प्रति भद्राय भद्रम

यह सूर्योदय होने का स्पष्ट चित्रण है। प्रकाशमान रश्मियों का समूह अथवा देवगण सूर्यमंडल के रूप में उदित हो रहे हैं। ये मित्र, वरुण अग्नि और संपूर्ण विश्व के प्रकाशक ज्योर्तिमय नेत्र हैं। इन्होंने उदित हो कर दयुलोक, पृथ्वी और अंतरिक्ष लोक को अपने देदीप्यमान तेज से परिपूर्ण कर दिया है। सूर्य अंतर्यामी होने के कारण सबके प्रेरक परमात्मा हैं तथा सृष्टि में जंगम और स्थावर की आत्मा हैं। सूर्य गुणमई एवं प्रकाशमान ऊषा देवी के पीछे-पीछे चलते हैं जैसे कोई मनुष्य सर्वांग सुंदरी युवती का अनुसरण करे। जब देवी ऊषा प्रकट होती हैं तब प्रकाश के देवता सूर्य की अराधना करने के लिए कर्मनिष्ठ मनुष्य अपने कर्तव्य कर्म का संपादन करते हैं। ऋग्वेद सें वर्णित यह स्तुति सूर्य के प्रभाव और पराक्रम की सुंदर व्याख्या है। वास्तव में सूर्य का रश्मिमंडल द्युलोक के ऊपर माना गया है और कहा गया है कि यह तत्काल द्युलोक और पृथ्वी का भ्रमण कर लेता है।
सूर्य रश्मियों में अद्भुत शक्ति है और इसी को देखते हुए महान वेदवेत्ता ऋषियों ने सूर्य विज्ञान का विकास किया। वे इसके द्वारा कुछ भी कर सकने में समर्थ थे। आगे चलकर साधकों ने इस पर अनेकानेक प्रयोग किए और सफलता पाई। हालांकि उन्होंने अपने इस ज्ञान को न तो सार्वजनिक किया और न ही उसका दुरुपयोग किया, कि इस तरह का प्रदर्शन कर वे लाभ कमा सकें। हां, कहीं-कहीं अपने ही भक्तजनों की जिज्ञासा शांत करने के लिए उन्होंने इसका प्रदर्शन किया और आंखों के सामने इसे घटित होते देख कर सब स्तब्ध रह गए। ऐसे ही एक भक्त ने अपने अनुभव में लिखा है।
परमहंस विशुद्धानंद से जुड़ी बातें इतनी असाधारण थीं कि उन पर सहसा कोई विश्वास नहीं कर सकता था। यह सच था कि उनके अंदर एक अलौकिक शक्ति थी जिसका अनुभव उनके संपर्क में आने वालों को हो जाता था। ऐसी ही एक संध्या को मैं उनके पास गया। सूर्यास्त होने में कुछ ही समय शेष था …मैंने देखा वह भक्तों से घिरे हुए थे। गेरु व में व्याघ्र चर्म पर आसीन वह महात्मा उस समय योगविद्या तथा प्राचीन आर्ष विज्ञान की गूढ़ व्याख्या कर रहे थे। उनकी पकी हुई उम्र सफेद लंबी दाढ़ी और चमकते विशाल नेत्रों में गजब का आकर्षण था।
वह कह रहे थे, कि किसी भी स्थान से किसी भी वस्तु का अर्विभाव किया जा सकता है। अभ्यासयोग और साधना का यही रहस्य है। सुनने वाले उन्हें आश्चर्य से देख रहे थे। अचानक उन्होंने आसन पर से एक गुलाब का फूल उठाया और कहा बोलो इसे किस रूप में बदल दिया जाए? मेरे मुंह से निकला-जवाकुसुम का फूल बना दें। वह जवाकुसुम के फूलों का मौसम नहीं था और मेरे सामने जो कुछ घटने जा रहा था वह जादू सरीखा ही था।
महात्मा ने बाएं हाथ में गुलाब का फूल लिया और दाहिने हाथ में एक स्फटिक यंत्र से इस पर सूर्य रश्मियां एकत्र कीं। देखते-देखते गुलाब में सुर्ख लाल आभा प्रकट हुई और मानो गुलाब का फूल अव्यक्त हो गया। अब उसकी जगह ताजा खिला हुआ झुमका जवाफूल नजर आ रहा था। स्मृति के लिए वह फूल मैं अपने घर ले आया। यह घटना कोई जादूगरी नहीं बल्कि एक शुद्ध वैज्ञानिक प्रयोग था।
यह सूर्य विज्ञान था, पर इसके अलावा चंद्र विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, शब्द विज्ञान, वायु विज्ञान, ध्वनि विज्ञान और समय विज्ञान भी हैं जिनसे ऐसे असंभव दिखते कार्यों को संभावित किया जा सकता है। परमहंस विशुद्धानंद का संबंध ज्ञानगंज से था। उस समय ज्ञानगंज में शिक्षा की दो शाखाएं प्रचलित थीं योग और पृकृति विज्ञान। तब वहां विशुद्धानंद जी छात्र थे और उन्होंने इन सब में दक्षता प्राप्त कर ली थी।
गुरु के रूप में योगिराज परमहंस विशुद्धानंद में ऐसी शक्ति थी कि सामान्य जन उनकी ओर खिंचा चला आता था। किसी को हल्के से छू देते तो समस्त शरीर में आनंद की लहरें उठने लगती थीं। लगता था कि संपूर्ण सृष्टि उनकी हथेली में ही समाई हुई है। उन्हें लोग गंध बाबा कहते थे और यह सच भी था। बाबा अपने शिष्यों के अंदर सुगंध की तरह ही व्याप्त थे।
परमहंस विशुद्धानंद के साथ अनेकों चमत्कार जुड़े रहे हैं। जैसे कि आकाश मार्ग से कहीं से कहीं तक चले जाना, शून्य से वस्तुओं को प्रकट कर देना, एक वस्तु को दूसरी वस्तु में परिवर्तित कर देना। खाने की थोड़ी मात्रा को बड़ी मात्रा में बदल देना, दूर हो रही घटनाओं को जान लेना, दीवार के पार बिना किसी बाधा के देख लेना और एक ही समय में कई जगह दिखाई पड़ना। यह सब उनके सामान्य गुणों में था। कहते हैं वह मृत व्यक्ति को भी जीवित कर सकते थे। उनका देहावसान 1937 में हुआ परंतु वह आज भी अपने शिष्यों के लिए विद्यमान हैं और उनके संकट में किसी न किसी रूप में आ कर सहायता करते हैं।

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