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ऊं वासुदेवाय नम:

ऊं वासुदेवाय नम:

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कार्तिक शुक्ल पक्ष की देव प्रबोधिनी एकादशी वह तिथि है, जब क्षीर सागर में सोए हुए भगवान विष्णु जागते हैं। स्थानीय भाषा में इसे देव उठानी एकादशी भी कहा जाता है। कहते हैं कि इसी दिन भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागते हैं। यह चातुर्मास की समाप्ति का संकेत है। श्री हरि के जागने के बाद से ही सारे मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार पहले भगवान के सोने-जागने का कोई नियम नहीं था। वे जब चाहते, लंबे समय के लिए योगनिद्रा में चले जाते और जब जागते, तो फिर महीनों जागते ही रहते थे।

vishnu2देवी लक्ष्मी इस अव्यवस्था से बेहद अप्रसन्न थीं। उन्होंने श्री हरि से ही इसकी शिकायत की और कहा कि आप जब सोते हैं तो आपके दर्शनों की इच्छा रखने वाले कितने ही ऋषि -मुनियों को निराश हो कर वापस चला जाना पड़ता है और इसका लाभ उठा कर दैत्य धरती पर अधर्म फैलाते हैं तथा सभी मानवों को पीड़ा देते हैं। भगवान विष्णु ने बड़े धैर्य से देवी लक्ष्मी की बात सुनी और कहा कि इस समस्या का समाधान वे शीघ्र ही कर देंगे। उसी के बाद से भगवान विष्णु ने अपनी योग निद्रा में जाने का समय निश्चित कर लिया कि वे मात्र चार महीने ही योग निद्रा में रहेंगे। चार महीने बाद जब उनका जागरण का दिन आता है तो अनेक प्रकार से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है तथा व्रत किया जाता है।

vishnu3व्रत करने वाली महिलाएं इस दिन सुबह स्नान कर आंगन में अल्पना बनाती हैं तथा चौक पूर कर उसमें भगवान विष्णु के चरणों को कलात्मक रूप से अंकित करती हैं। दिन की तेज धूप से बचाने के लिए श्री विष्णु के चरणों को फूलों से ढक दिया जाता है। रात्रि को विधिवत पूजन करते हैं और अगली सुबह शंख, घंटा-घडिय़ाल बजा कर भगवान को जगाया जाता है व कथा सुनी जाती है। पापों से मुक्ति के लिए तथा मोक्ष प्राप्त करने के लिए यह एकादशी अत्यंत श्रेष्ठ मानी गई है।

vishnu4भीष्म पंचम
यह व्रत कार्तिक शुक्ल एकादशी से आरंभ हो कर पूर्णिमा को समाप्त होता है। इसलिए इसे भीष्म पंचम कहते हैं। घर के आंगन या नदी तट पर सुंदर सा मंडप तैयार करें। वह स्थान गोबर से लीप कर शुद्ध करें। यदि स्थान कच्चा नहीं है तो गंगा जल आदि से वह स्थान पवित्र करना चाहिए। वहां वेदी बनाएं तथा तिल भरकर कलश की स्थापना करें।

मंडप में विष्णु प्रतिमा की स्थापना कर षोडशोपचार पूजन करें तत्पश्चात ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र से भगवान वासुदेव की अराधना करनी चाहिए तथा ऊँ विष्णवे नम: स्वाहा मंत्र से तिल, जौ की 108 आहुतियां दे कर हवन करना चाहिए। सामान्य पूजा के अतिरिक्त पहले दिन भगवान के हृदय का कमल पुष्पों से पूजन करें, दूसरे दिन कटि प्रदेश का विल्व पत्रों से पूजन करें तीसरे दिन घुटनों का केतकी के फूलों से पूजा करें, चौथे दिन चरणों का चमेली से तथा पांचवें दिन संपूर्ण विग्रह का तुलसी की मंजरियों से पूजा करें। यह व्रत पाप नाशक और अक्षय फलदायक है।

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