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मनमोहक मधुबनी पेंटिंग

मनमोहक मधुबनी पेंटिंग

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सदियों से मिथिला की औरतें पारंपरिक रूप से अपने घरों-दरवाजों पर चित्रों को उकरेती रही हैं। इन चित्रों में एक पूरा संसार रचा जाता रहा है, लेकिन इस चित्रशैली ने पिछले कुछ दशकों में समाज के हाशिए पर रहने वाली महिलाओं को एक नई पहचान दी है और घर से बाहर कदम रखने की आजादी भी। हज़ारों कलाकारों को प्रशिक्षित कर चुकी मिथिला पेंटिंग की प्रतिष्ठित कलाकार महासुंदरी देवी की ‘कर्ची कलम (बांस से बना कूची)’ अब रंग नहीं भरती है। उनके आंगन में प्रवेश करते ही ऐसा लगता है जैसे कि आप किसी कला दीर्घा में आ गए हों। रांटी स्थित उनके घर की दीवारों, दरवाजों पर मधुबनी चित्रशैली में राम-सीता, राधा-कृष्ण, पशु-पक्षियों, फूल-पत्तियों का मोहक संसार और कमरों में कोहबर की चिर-परिचित सधी हुई रेखाएं और गहरे चटक रंगों की छटा छाई है।

madhu4पूस की इस हल्की धूप में आस-पड़ोस के गांव की स्त्रियां आंगन के बीचों-बीच मड़वे पर महासुंदरी देवी और कर्पूरी देवी की देख-रेख में सुजनी बना रही है (कपड़े पर मधुबनी चित्रशैली का रेखांकन)। मिथिलांचल में महिलाएं शादी-विवाह, और पर्व-त्योहारों पर लंबे समय से दीवारों, कपड़ों और कागजों पर अनुष्ठानिक चित्र बनाती रही हैं। कोहबर, दशावतार, अरिपन, बांसपर्री और अष्टदल कमल शादी के अवसर पर घरों में बनाए जाते रहे है। इन चित्रों का लौकिक और आध्यात्मिक महत्व है। कायस्थ-ब्राह्मण घरों में लड़कियों की शादी के समय जहां इन पारंपरिक देवी-देवताओं के चित्रों को घर की दीवारों पर बनाया जाता रहा है, वहीं लड़कों की शादी के अवसर पर लड़की वालों के घर कागज़ पर उकेरी गई इन्हीं चित्रों में सिंदूर भर कर भेजने का रिवाज आज भी कायम है। किसी भी लोक कला की तरह मिथिला पेंटिंग पीढ़ी दर पीढ़ी एक परंपरा के रूप में प्रवाहमान रही।

महासुंदरी देवी बताती हैं कि उनका जन्म एक गरीब कायस्थ परिवार में हुआ। जब वह छोटी थी तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया था और उन्हें उनकी चाची ने पाला-पोसा। उन्होंने अपनी चाची देव सुन्दर देवी से इस कला को आत्मसात किया। मधुबनी जिले के जितवारपुर गांव की जगदंबा देवी, सीता देवी और रसीदपुर गांव की गंगा देवी के साथ मिथिला पेंटिग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलवाने में महासुंदरी देवी की खास भूमिका रही है। अनेक पुरस्कारों से सम्मानित महासुंदरी देवी को वर्ष 2011 में भारत सरकार ने कला के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए पद्म श्री देकर सम्मानित किया।
madhu2मिथिला पेंटिंग आज भले ही ‘मधुबनी पेंटिग’ के नाम से जानी जाती हो, लेकिन मिथिलांचल के दरंभगा और मधुबनी जिलों के लगभग हर गांवों में पारंपरिक रूप से यह बनाई जाती है। सही मायनों में इसे मिथिला पेंटिंग नाम देने से ही विस्तार मिलता है। 70 और 80 के दशक में इस पेंटिंग की धूम जर्मनी, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, अमेरिका, जापान आदि देशों की कलादीर्घाओं में रही।

भारत की इस पारंपरिक कला ने पश्चिमी कलाप्रेमियों को अपनी ओर आकृष्ट किया उन्हें इन चित्रों में परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत मेल दिखा। सीता देवी, गंगा देवी की चित्र शैली और विषय वस्तु ने इस कला को नई जुबान दी। पेंटिंग के समांतर देखने लगे। कहते हैं कि पाब्लो पिकासो भी मिथिला पेंटिंग को देख प्रभावित हुए थे। इन कलाकारों की विदेश यात्राओं और सम्मानों ने आस-पड़ोस के गांव की महिलाओं को इस कला की ओर तेजी से आकृष्ट किया।
ताज्जुब है कि मिथिला पेंटिंग को लेकर स्थानीय लोग और राज्य शुरू से उदासीन रहे हैं। बस परंपरा के रूप में वे इसका निर्वहन पीढ़ी दर पीढ़ी करते चले आ रहे हैं। वर्ष 1934 में बिहार में भारी भूकंप आया था जिसमें जान-माल की काफी क्षति हुई थी। भूकंप पीड़ितों को सहायता पहुंचाने के दौरान तत्कालीन ब्रितानी अफसर और कला प्रेमी डब्ल्यू जी. आर्चर की निगाहें क्षतिग्रस्त मकानों की भीतों पर बनी रेल, कोहबर वगैरह पर पड़ी।

madhu5मंत्रमुग्ध उन्होंने इन चित्रों को अपने कैमरे में कैद कर लिया। बाद में वे इस कला के संग्रहण और अध्ययन में जुट गए। वर्ष 1949 में ‘मार्ग’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में उन्होंने ‘मैथिली पेंटिग’ नाम से एक लेख लिखा जिसमें इस कला में प्रयुक्त बिंबों और प्रतीकों का विवेचन है। चित्रों के आध्यात्मिक अर्थ और विभिन्न शैली की पड़ताल की गई है। इस लेख के बाद देश-विदेश के कलाप्रेमियों की नज़र इस चित्रशैली पर गई। 60 के दशक में ऑल इंडिया हैंडिक्राफ्ट बोर्ड के तब की निदेशक पुपुल जयकर ने मुंबई के कलाकार भाष्कर कुलकर्णी को मिथिला क्षेत्र में इस कला को परखने के लिए भेजा। बिहार सरकार वर्षों से मधुबनी में एक संग्रहालय बनाने की बात करती रही है, लेकिन अभी तक उसे अमलीजामा नहीं पहनाया गया है।
बहरहाल, इन वर्षों में मिथिला चित्र शैली की विषय वस्तु और भाव ही नहीं बदले हैं बल्कि रंग भी बदले हैं।

पहले लोक में आसानी से मिलने वाली रंगों का ही इस पेंटिंग में इस्तेमाल होता था। मसलन, हरी पत्तियों से हरा, गेरु से लाल, काजल और कालिख से काला, सरसों और हल्दी से पीला, सिंदूर से सिंदूरी, पिसे हुए चावल, दूध और गोबर से बने रंगों से ही कलाकार चित्रों को उकेरते थे, लेकिन वर्तमान में ज्यादातर कलाकार देशज और प्राकृतिक रंगों के बदले एक्रिलिक रंगों का इस्तेमाल करने लगे हैं जिससे इनके बिखरने का खतरा नहीं रहता। आज जहां बाजार में भारतीय कला को मुंह-मांगी कीमतों पर खरीदा-बेचा जा रहा है, वहीं मिथिला शैली पर पहचान का संकट है। उसे एक बार फिर से ‘लोक कला’ के खांचे में फिट करने उसकी परवाज रोकने की साजिश की जा रही है। गैर सरकारी संस्थानों और सरकार दोनों इसके लिए जिम्मेदार है।

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