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कुल्लू दशहराः अंततः महेश्वर पालकी में सवार होकर निकले

कुल्लू दशहराः अंततः महेश्वर पालकी में सवार होकर निकले

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कुल्लू। अंततः दशहरा उत्सव  के दूसरे दिन आगे.आगे नरसिंह भगवान की घोड़ी और पीछे-पीछे भगवान रघुनाथ के छड़ीबरदार महेश्वर सिंह पालकी में सवार होकर, चारों तरफ देवी-देवता अपने-अपने हारियानों के कंधों पर ढोल नगाड़ों की थाप पर लोगों के दुख निवारण करने के लिए परिक्रमा पर निकले। इस परिक्रमा को नरसिंह की जलेब कहते हैं। इस दौरान भारी सख्या में लोगों ने नरसिंह का आशीर्वाद लिया।

  • लोगों के दुखों का निवारण करने के लिए चली आ रही भगवान नरसिंह की जलेब को राज रूपी के शिविर से निकली।
  • सबकी नजरें राज परिवार के मुख्य एवं भगवान रघुनाथ के छड़ीबदार महेश्वर सिंह पर टिकी हुई थी।

पालकी में सवार होने को लेकर पिछले दिनों जमकर बयानबाजी जो हुई थी। खैर आज महेश्वर सिंह ने साढ़े तीन शताब्दियों से चली आ रही palki-3परंपरा का निर्वाह करते हुए देवी-देवताओं व बाध्य यंत्रों की धुनों के साथ इस जलेब से पूरे ढालपुर की परिक्रमा की और अंत में राजा के चानणी के पास इस जलेब का समापन हुआ। ऐतिहासिक दशहरा उत्सव में इस जलेब का भी बहुत महत्व है, राजा को नरसिंह की गद्दी प्राप्त हुई है। इसलिए इस समय नरसिंह के रूप में राजा को देखा जाता है। वर्तमान समय में इसे राजा की जलेब कहा जाता है।

जलेब है कुल्लू दशहरा की सांस्कृतिक धरोहर
लोक नृत्य उत्सव कुल्लू दशहरा में चलने वाली राजा की जलेब कुल्लू की सांस्कृतिक धरोहर है। कुल्लू दशहरे के साथ राजा की जलेब राजा की शोभायात्रा का विशेष महत्व है। रथयात्रा के दूसरे दिन से ही रघुनाथ के अस्थायी कैंप के साथ राजा की चानणी से चलकर यह जलेब ढालपुर मैदान के चारों ओर से होती हुई पुनः राजा की चानणी के पास समाप्त हो जाती है।

  • इस शोभायात्रा में रघुनाथ के छड़ी वरदार महेश्वर सिंह को पालकी में बिठाकर ढालपुर मैदान के चक्कर लगाए जाते है। यह परंपरा लंका दहन तक निभाई जाती है। इस परंपरा को कुछ लोग जहां हैरतअंगेज बताते है।

palki-2वहीं कुल्लू घाटी के कुछ लोग इसके प्रबल समर्थक है तथा इसे अपनी सांस्कृतिक धरोहर बताकर इसे अपना गौरव मानते है। इस जलेब में रघुनाथ के छड़ीबरदार द्वारा चयनित कुछ देवता तथा नरसिंह की घोड़ी सज-धजकर जलेब में चलती है। रघुनाथ के छड़ीबरदार की पालकी देवताओं के बीच में रहती है। जिसमें रघुनाथ जी के छड़ीबरदार राजसी पोशाक में जलेब की शोभा बढ़ाते है।

क्या है जलेब की कहानी
जनश्रुति अनुसार राजा की रियासत के समय कई महत्व के कारण यह जलेब निकाली जाती थी, जिसमें सर्वप्रथम सुरक्षा की दृष्टि से इस जलेब के महत्व को देखा जाता था क्योंकि राजा की रियासत के समय कुल्लू घाटी के लगभग सभी देवता दशहरा में भाग लेने के लिए ढालपुर के मैदान में पहुंचते थे तथा इन देवताओं के साथ आने वाले अधिकतर लोग अपने देवताओं के साथ ही रहते थे। राजा का जलेब में जाने का महत्व यह माना जाता था कि एक तो राजा दशहरे में आई प्रजा को आम दर्शन दें सके तथा दूसरा राजा दशहरे की प्रशासनिक व्यवस्था का स्वयं अवलोकन कर सक और किसी बाहरी शक्ति का आक्रमण प्रजा पर न हो।

लोक नृत्य प्रतियोगिता विशेष आकर्षण
दशहरा उत्सव में इस बार लोक नृत्य प्रतियोगिता विशेष आकर्षण केंद्र का केंद्र बनीं हुई। लाल चंद प्रार्थी में लोक नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन दिन के समय किया जा रहा है। इस प्रतियोगिता में हर रोज पांच सांस्कृतिक दल कुल्लवी नाटी प्रस्तुत कर रहे हैं। लोक नृत्य प्रतियोगिता के पहले दिन कुल्लू जिला के पांच सांस्कृतिक दलों ने भाग लिया है। इस भुट्टिको सांस्कृतिक दलए लक्ष्मी सांस्कृतिक दल समेत कई दल शामिल थे। पहले दिन इन दलों ने कुल्लवी नाटी प्रस्तुत की।

दिन भर हुई प्रतियोगिताओं में पहले स्थान पर रखने वाले दल को शाम को सांस्कृतिक दल को रात्रि सांस्कृतिक संध्या में नाटी करने का अवसर मिलेगा। लोक नृत्य प्रतियोगिता में विभिन्न दिन प्रथम स्थान पर रहने वाले दलों में भी प्रतियोगिता करवाई जाएगी और जो दल प्रथम स्थान पर रहेगा उसे 51 हजार रुपये का पुरस्कार भी दिया जाएगा। लोक नृत्य प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पर रहने वाले दल को 17 अक्तूबर को दशहरा उत्सव के समापन पर सीएम वीरभद्र सिंह सम्मानित करेंगे।

https://youtu.be/7SJPlw4OLh0

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