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हर राज्य में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है मकर संक्रांति का पावन पर्व

हर राज्य में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है मकर संक्रांति का पावन पर्व

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लोहड़ी के अगले दिन मकर संक्रांति मनाई जाती है। कहा जाता है कि भगवान सूर्य जब धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं तब मकर संक्रांति मनाई जाती है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश पर उसकी किरणों से अमृत की बरसात होने लगती है। मकर संक्रांति को सूर्य के उत्तरायण होने से गरम मौसम की शुरुआत हो जाती है। सबसे खास बात यह है कि मकर संक्रांति खरमास की समाप्ति और शुभ कार्यों की शुरुआत है। इस दिन से ही घरों में शादी-ब्याह, मुंडन और नामकरण जैसे शुभ कार्य शुरू हो जाते हैं।

मकर संक्रांति का त्योहार विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व भी कहा जाता है। इस दिन सूर्य की पूजा की जाती है। चावल और दाल की खिचड़ी खाई और दान की जाती है। गुजरात और राजस्थान में यह दिन उत्तरायण पर्व के रूप में मनाया जाता है, पतंग उत्सव का आयोजन किया जाता है। आंध्रप्रदेश में संक्रांति के नाम से तीन दिन का पर्व मनाया जाता है। तमिलनाडु में किसानों का ये प्रमुख पर्व पोंगल के नाम से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में लोग गजक और तिल के लड्डू खाते हैं और एक-दूसरे को भेंट देकर शुभकामनाएं देते हैं। पश्चिम बंगाल में हुगली नदी पर गंगा सागर मेले का आयोजन किया जाता है तो असम में भोगली बिहू के नाम से इस पर्व को मनाया जाता है।

मकर संक्रांति पर सूर्य की पूजा का विशेष महत्व है। ऐसे में अगर भाषा और उच्चारण शुद्ध हो तो आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ अवश्य करें क्योंकि यह एक बहुत ही फलदायक रहेगा। कहते हैं अगर मकर संक्रांति पर विशेष 5 सूर्य मंत्र का जाप किया जाए तो लाभ ही लाभ होता है।

यह हैं 5 मंत्र :

ॐ घृ‍णिं सूर्य्य: आदित्य:
ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणराय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा।
ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर:।
ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ।
ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः।

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