Expand

मानसरोवर के हंस…

मानसरोवर के हंस…

- Advertisement -

अन्ना अब शायद लिखने के लिए कुछ नहीं रह गया है और अब उसका कुछ अर्थ भी नहीं है मैं पत्र लिखता हूं और उन्हें बम्बई के इस समुद्र में पोस्ट कर देता हूं। पता नहीं वे अपने पतों तक पहुंचते हैं या नहीं। वैसे भी किसी पत्र का अर्थ क्या है, वह पहुंचे या न पहुंचे। पत्र लिखना और कहानियां लिखना लगभग एक सी बात है । कहने के लिए तो सिर्फ एक ही बात है कि हर व्यक्ति की यातना और दु:ख अलग हो सकते हैं, पर उसकी मुक्ति का संघर्ष एक है। सबकी मुक्ति में हर एक की मुक्ति है और एक व्यक्ति की मुक्ति से भी हर एक की मुक्ति का रास्ता खुलता है।
अन्ना याद करो तुम्हीं ने अपने एक खत में लिखा था कि बरसात के धुंधलके में हर बात ज्यादा साफ होकर कौंधती है और यादों की बारिश में नहा कर दिल आजाद हो जाता है। और वह भी एक बरसाती रात थी। मैं मैनपुरी में पुराने पुश्तैनी घर में था। धूल भरा वह कस्बा और अन्ना बड़े शहरों में बड़ी-बड़ी इमारतें बारिश को पी जाती हैं, पर कस्बे में बारिश सबको साथ-साथ भिगोती है। अन्ना मैं तुम्हें एक बार जरूर अपने कस्बे के इस घर में ले आऊंगा। मैं तुम्हें हर चीज दिखाना चाहूंगा।
तो वह बरसाती रात थी उस रात की हर बात साफ याद है। वही पुराना घर जलती हुई लालटेन और घनघोर बारिश। एकाएक देखा- एक भीगती हुई छाया खिड़की के सींकचों के पार खड़ी थी। मैंने दरवाजा खोला वे एक बिल्कुल बीते हुए वृद्ध व्यक्ति थे संन्यासी से लगते से जैसे कोई जला हुआ राख का आदमी श्मशान से उठ कर चला आया हो। कुछ देर बाद उन्होंने पूछा – यह जगदंबे दादा का घर है?
बाबूजी का नाम सुनने के बावजूद मैं यह भी नहीं याद नहीं कर पाया कि यह मेरे पिताजी का नाम है। मैंने कहा – हां यही उनका घर है। आप कहां से आए हैं ?
-तिब्बत से। उनकी आवाज में कोई आसक्ति नहीं थी उन्होंने कुछ इस तरह तिब्बत का जिक्र किया था जैसे वह दूर देश नहीं यहीं पास वाली गली में कोई जगह हो।
-तुम कौन हो ?
-मैं उनका सबसे छोटा लड़का हूं।
-घर पर कोई है? उन्होंने सपाट आवाज में पूछा।
-हां अम्मा हैं।
उन्हें बुला सकते हो?
और अम्मा आईं तो बात साफ हो गई रि वे मेरे चाचा थे सेनापति चाचा। वे तीस वर्षों बाद तिब्बत से लौटे थे। वे वहां जाकर बौद्ध हो गए थे और भारत में शरण लेने आए दलाई लामा के काफिले के साथ आए थे।
सेनापति चाचा की कहानी में कुछ ऐसा है जो गुस्से से भर देता है। जो हमारे मासूम विश्वास को ध्वस्त करता है… यही, कि वही छला जा सकता है जिसके पास विश्वास है। वह क्रांति का दौर था। उस समय सेनापति चाचा रियासत की फौज में हवलदार थे। अंग्रेजी फौज ने किले को घेर लिया। राजा साहब के पास ज्यादा फौज नहीं थी वे पलायन को मजबूर हुए पर अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। मेरे बाबा राजा साहब की रक्षा करने वाली छोटी टुकड़ी में थे वे भी मारे गए। हार कर रानी साहिबा ने समझौता कर लिया। यह समझौता कराने वाले मेरे यही चाचा थे। वे अंग्रेजों से मिल गए थे। आगे चलकर एक तरह से वे अघोषित महाराजा ही हो गए। वक्त गुजरा और रानी साहिबा को घनघोर गठिया हो गया। जो किसी भी तरह ठीक नहीं हो सका तब रियासत के राज वैद्य ने कहा कि वे अगर हंसों का मांस खा सकें तो ठीक हो सकती हैं। सेनापति रानी साहिबा के लिए सैनिकों को लेकर हंसों को लाने मानसरोवर चले गए। हमारा परिवार तब से उनसे घृणा करता था।
यात्रा लंबी थी बहुत दिनों बाद वे लम्बा सफर तय करके वे मानसरोवर के पास पहुंच रहे थे तो उस समय मानसरोवर में हंस और बर्फ की शिलाएं एक रूप होकर तैर रही थीं। सफेद हंस शिला खंडों की तरह और शिलाखंड हंसों की तरह।
सैनिकों के वहां पहुंचते ही हंसों और शिलाखंडों का अंतर स्पष्ट हो गया।
हंसों ने उन्हें आते देखा तो वे डर के मारे किनारे से हट कर बीच झील में जमा हो गए। सेनापति और उनके पांचों सैनिक सोचने लगे कि हंसों को कैसे मारा जाए।
झील के बीचोंबीच हंस जमा थे। हंसों की तरह ही श्वेत हिम के टुकड़े भी मानसरोवर के पानी में यहां-वहां तैर रहे थे। तब एक सैनिक ने कहा-सेनापति जी! क्यों न हम यहीं से गोली चलाकर दस-पांच हंसों को मार लें! तैर कर जाएं और मरे हुए हंसों को उठा लाएं!
सेनापति ने कहा-नहीं, नहीं! यह नादानी ठीक नहीं। मानसरोवर का पानी इतना ठण्डा है कि तुम वहां तक जिन्दा नहीं पहुंच पाओगे, पहुंच भी गए तो जिन्दा नहीं लौट पाओगे!
दूसरे दिन सेनापति फिर सैनिकों के साथ पहुंचे। किनारे पर तैरते हंसों ने देखा तो वे पहले की तरह ही बीच झील में जाकर जमा हो गए!
तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे दिन भी यही हुआ। तब सातवें दिन सेनापति ने एक तरकीब सोची। वे झील की ओर आते हुए दिखाई दिए तो रोज की तरह हंस बीच झील में जमा हो गए। सेनापति सहित पांचों सैनिक झील के किनारे खड़े हो गए। हंसों ने फिर उन्हें गौर से देखा और तब एक विश्वास का दृश्य उदित हुआ। और आश्चर्य की बात यह हुई कि जो हंस इन सैनिकों को देख कर बार-बार तट से मध्य झील में लौट जाते थे आज वे झील से किनारे की ओर लौट आए। तट के पास लौटकर वे बड़े विश्वास से पंख फडफ़ड़ाने लगे उन्हें बड़े प्यार से देख कर अपनी रेशमी गर्दनें बढ़ा-बढ़ा कर उनका स्वागत करने लगे। सेनापति की तरकीब काम कर गयी थी।
सैनिकों ने हंसों की गर्दन मरोड़ी और उन्हें बोरों में भर लिया!
दोस्तों! कहानी तो खत्म हो गई। लेकिन आप मन ही मन सोच रहे होंगे कि यह हुआ कैसे? हंस कैसे छले गए यह खुद सेनापति चाचा ने अम्मा को बताया था। उन्होंने कहा- यह हमने जान लिया था कि हमारे सैनिक वेश को देख कर हंस तट से झील में चले जाते थे। फिर हमने पोशाकें बदल लीं और सैनिकों का वेश उतार कर साधुओं जैसे वल्कल पहन लिए फिर मानसरोवर के तट पर जाकर खड़े हो गए थे।
मानसरोवर के वे हंस हम पर विश्वास कर तट तक आ गए थे। वे सैनिक सेनापति की तरकीब के मुताबिक साधुओं के वेश में आए थे और हंस छले गए थे!..
-और तब तुमने उन्हें पकड़कर उनकी गर्दनें मरोड़ लीं और उन्हें अपने बोरे में बन्द कर लिया था …यही न यानी तुमने साधुओं का वेश धारण करके हंसों को छला था। अम्मा ने बहुत तुर्शी से कहा था।
-हां पर उसके बाद मैं बहुत व्याकुल हो गया था मेरी आत्मा मुझे धिक्कारने लगी थी। मैं मानसरोवर के पावन तट से ही लापता हो गया था और तिब्बत पहुंच कर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था पर वहां तिब्बत में हम भी उन्हीं हंसों की तरह छले गए। वे सांस्कृतिक दूत बनकर आए थे पर वे सैनिक थे सांस्कृतिक दूत नहीं।
हम ने उन्हें नहीं पहचाना जब पहचाना तो भागकर यहां शरण ली। मैं आज यहां प्रायश्चित करने लौटा हूं।
अन्ना हर दौर में मानसरोवर में हंस छले जाते रहे हैं और छले जाते रहेंगे।

-कमलेश्वर

- Advertisement -

Facebook Join us on Facebook Twitter Join us on Twitter Google+ Join us on Google+ Instagram Join us on Instagram Youtube Join us on Youtube

RELATED NEWS

हिमाचल अभी अभी बुलेटिन

Download Himachal Abhi Abhi App Himachal Abhi Abhi IOS App Himachal Abhi Abhi Android App

राशिफल

Himachal Abhi Abhi E-Paper



सब्सक्राइब करें Himachal Abhi Abhi अलर्ट
Logo - Himachal Abhi Abhi

पाएं दिनभर की बड़ी ख़बरें अपने डेस्कटॉप पर

अभी नहीं ठीक है