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स्तम्भन की देवी है मां बगलामुखी

स्तम्भन की देवी  है मां बगलामुखी

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माता बगलामुखी दस महाविद्या में आठवीं महाविद्या हैं। इन्हें पीताम्बरा भी कहते हैं। ये स्तम्भन की देवी हैं। कहा जाता है कि सारे ब्रह्माण्ड की शक्ति मिल कर भी इनका मुकाबला नहीं कर सकती। शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद विवाद में विजय के लिए इनकी उपासना की जाती है। इनकी उपासना से शत्रुओं का स्तम्भन होता है तथा जातक का जीवन निष्कंटक हो जाता है। किसी छोटे कार्य के लिए दस हजार तथा असाध्य से लगने वाले कार्य के लिए एक लाख मंत्र का जाप करना चाहिए।

बगलामुखी मंत्र के जाप से पूर्व बगलामुखी कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए। वास्तव में शत्रुओं को नष्ट करने की इच्छा रखने वाली परमात्मा की संहार शक्ति ही बगला है। पीताम्बरा विद्या के नाम विख्यात बगलामुखी की साधना प्रायः शत्रुभय से मुक्ति और वाक सिद्धि के लिए की जाती है। इनकी उपासना में हल्दी की माला पीले फूल और पीले वस्त्रों का विधान है।


भगवती बगलामुखी के प्रदुर्भाव की कथा इस प्रकार है :

सतयुग में सम्पूर्ण जगत को नष्ट करने वाला भयंकर तूफान आया। प्राणियों के जीवन पर संकट को देख कर भगवन विष्णु चिंतित हो गये। वे सौराष्ट्र देश में हरिद्रा सरोवर के समीप जाकर भगवती को प्रसन्न करने के लिये तप करने लगे। श्रीविद्या ने उस सरोवर में बगलामुखी रूप में प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया तथा विध्वंसकारी तूफान का तुरंत स्तम्भन कर दिया। बगलामुखी महाविद्या भगवन विष्णु के तेज से युक्त होने के कारण वैष्णवी है। मंगलयुक्त चतुर्दशी की अर्द्धरात्रि में इसका प्रादुर्भाव हुआ था। श्री बगलामुखी को ब्रह्मास्त्र के नाम से भी जाना जाता है।

शत्रु दमन तथा रोग एवं दुखदारिद्रय तथा कलह से देती है मुक्ति

दश महाविद्याओं में बगलामुखी एक मात्र ऐसी देवी है जिसकी साधना शत्रु दमन तथा रोग एवं दुखदारिद्रय तथा कलह से मुक्ति प्राप्त करने के विशेष उद्देश्य से की जाती है। यह साधना किस प्रकार और कब अनुष्ठान किया जाए यह जानना जरूरी है। मूलतः यह साधना तंत्र से संबंधित है, तांत्रिक षट्कर्मों में विशेषकर स्तंभन के लिए रामबाण है। यह साधना सुख-समृद्धि, राजनीतिक लाभ, वाक् सिद्धि, संतान प्राप्ति, तंत्र-सिद्धि, गृह-शांति, शत्रुनाश, वशीकरण, उच्चाटन, रोग, दरिद्रता, मुकदमा एवं जेल से मुक्ति के लिए की जाती है। किसी योग्य अनुभवी व्यक्ति के मार्गदर्शन में ही की जानी चाहिए। साधना काल में श्रद्धा, विश्वास, आत्मसंयम एवं ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है। यदि इस समय अलौकिक अनुभूति हो तो विचलित नहीं होना चाहिए। साधना रात्रि के समय देवी के मंदिर, पर्वत, पवित्र नदी के तट पर या किसी सिद्ध स्थल पर एकांत में की जानी चाहिए।


 

 

 

 

 

 

 

 

 

माता के प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर दतिया, नलखेड़ा, खरगौन, वाराणसी एवं हिमाचल में बनखंडी, कोटला तथा गगरेट में स्थित हैं। ये स्थान तंत्र-साधना के प्रमुख शक्ति स्थल हैं। साधना के लिए चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर माता का चित्र, बगलामुखी यंत्र, कलश एवं अखंड दीपक स्थापित करें। माता बगलामुखी के भैरव मृत्युंजय हैं। अतः साधना के आरंभ में महामृत्युंजय की एक माला एवं बगला कवच का पाठ करना चाहिए। साधक पीले वस्त्र धारण कर पीले आसन एवं हरिद्रा (हल्दी) की माला, पीले रंग की पूजन सामग्री, प्रसाद आदि ले। उपासक अपनी मनोकामना के लिए संकल्प लेकर पूजा आरंभ करे।

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