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जंगी-थोपन के लिए नए उपक्रम तलाशेगा ऊर्जा मंत्रालय

जंगी-थोपन के लिए नए उपक्रम तलाशेगा ऊर्जा मंत्रालय

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यशपाल शर्मा/शिमला। लंबे समय से विवादों में घिरी जंगी थोपन-पोवारी 960 मेगावाट जल विद्युत परियोजना कांग्रेस सरकार के गले की फांस बनी हुई है। रिलायंस के परियोजना में रूचि न दिखाने के बाद वीरभद्र सरकार को इसे पूरा कराना आसान नहीं दिख रहा। इसलिए सरकार ने अब इस प्रोजेक्ट के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के नए उपक्रम तलाशने का फैसला लिया है। बुधवार को सचिवालय में सीएम वीरभद्र सिंह की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में प्रोजेक्ट पर लंबी चर्चा हुई। ऊर्जा मंत्री सुजान सिंह पठानिया सहित अन्य ने भी इस पर अपनी राय दी। सीएम ने अधिकारियों व कैबिनेट सहयोगियों के साथ इस पर चर्चा की। सहमति से निर्णय लिया गया कि परियोजना पूरी कराने को और विकल्प ढूंढे जाएं। इसलिए कैबिनेट ने प्रदेश क्र ऊर्जा मंत्रालय व विभाग को अधिकृत कर दिया। ये राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों यानि कंपनियों के साथ प्रोजेक्ट को लेकर चर्चा करेंगे। चूंकि इसके शुरू न होने से सरकार को राजस्व चपत लग रही है, साथ ही मार्किट में नाम खराब हो रहा है।

kinnour-1वीरभद्र सिंह मंत्रिमंडल ने विभाग को भी किया अधिकृत

बता दें कि टेंडर के फेर में फंसी 960 मेगावाट क्षमता वाली इस परियोजना पर सरकार अभी तक असमंजस की स्थिति में थी। सरकार ने एक साल पहले परियोजना को स्थापित करने के लिए रिलायंस से समझौता किया था। लेकिन कंपनी ने परियोजना को लेने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। सरकार को उम्मीद थी कि रिलायंस से अपफ्रंट मनी आने के बाद ब्रेकल कंपनी से आई 280 करोड़ की अपफ्रंट मनी अदानी को वापस कर दी जाएगी, मगर रिलायंस ने परियोजना के नाम पर पूरे एक साल तक सरकार को भ्रम में ही रखा। ये परियोजना दस साल से विवादों में उलझी हुई है। इसका आवंटन सबसे पहले ब्रेकल को किया गया, जिसे रिलायंस ने न्यायालय में चुनौती दी। इस प्रोजेक्ट की लड़ाई देश के सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंची। इसके बाद केस में अदानी की एंट्री हुई। अदानी से पैसा लेकर ब्रेकल ने सरकार को दिया था, लेकिन सरकार को ब्रेकल के पांच से छह साल बाद मिले पत्र से पहले इसकी कोई जानकारी नहीं थी। वर्ष 2006 में राज्य सरकार ने इस प्रोजेक्ट का टेंडर किया था। टेंडर में यह काम ब्रेकल को आवंटित किया गया। ब्रेकल ने अदानी से लेकर अपफ्रंट मनी की 280 करोड़ की राशि सरकार को दी। न्यायालय ने मामला आने पर सरकार को प्रोजेक्ट को अपने स्तर पर फैसला लेने के निर्देश दिए। सरकार ने 2009 में इस प्रोजेक्ट के आवंटन को रद कर दिया।

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