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राहत की बातः प्रदेश में Sterilization से कम हुए बंदर

राहत की बातः प्रदेश में Sterilization से कम हुए बंदर

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Sterilization : धर्मशाला। प्रदेश में बंदरों की संख्या में कमी जरूर आई है, लेकिन यह कमी बंदरों को वर्मिन घोषित करने के कारण नहीं अपितु बंदरों की नसबंदी के कारण आई है। यह बात वन विभाग के अतिरिक्त सचिव तरूण कपूर ने धर्मशाला में पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में कही। कपूर ने कहा कि प्रदेश में पहले तकरीबन साढ़े तीन लाख बंदर थे, जिनकी संख्या अब करीब सवा दो लाख रह गई है। बंदरों की संख्या में यह कमी बंदरों को मारने की इजाजत मिलने से नहीं आई। बंदरों की नसबंदी काफी कारगर रही है और इस वर्ष विभाग ने पूरे प्रदेश में 21 से 22 हजार बंदरों की नसबंदी का लक्ष्य रखा है, जो कि गत वर्ष के लक्ष्य से अधिक है।

वन विभाग के अतिरिक्त सचिव बोले, इस साल 21 से 22 हजार बंदरों की नसबंदी का टारगेट

कपूर ने कहा कि जब से बंदरों को वर्मिन घोषित किया गया था तब से अब तक बंदरों को मारने के कोई ज्यादा मामले सामने नहीं आए हैं। इक्का दुक्का मामलों में कुछ ही बंदरों को मारा गया है। तरूण कपूर ने कहा कि बुधवार को बंदरों को मारने की अवधि समाप्त हो गई है। इस अवधि को बढ़ाने के साथ-साथ 53 अन्य तहसीलों में बंदरों को वर्मिन घोषित करने के लिए केंद्र को बहुत पहले ही पत्र भेजा था, जिसकी स्वीकृति अभी तक भारत सरकार से नहीं मिल पाई है। इसलिए बुधवार के बाद से बंदरों को नहीं मारा जा सकेगा।  कपूर ने कहा कि यदि कोई बंदर या अन्य जानवर अत्यंत खूंखार हो जाता है और इंसानों को नुकसान पहुंचाता है तो उसे मारने की अनुमति वन विभाग के चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन द्वारा जारी की जा सकती है।


बंदरों को शहरों में मिल रहा खाना

तरूण कपूर का कहना है कि बंदरों ने जंगलों को छोड़कर शहरों का रुख कर लिया है, जिसके कारण इनकी संख्या बहुत अधिक लग रही है। बंदरों द्वारा शहरों का रुख करने का एक सबसे बड़ा कारण शहरों के कूड़ेदानों में पर्याप्त मात्रा में खाद्य पदार्थों का उपलब्ध होना है। वनों में बंदरों के खाने के लिए ज्यादा कुछ बचा नहीं है तो बंदर आसानी से उपलब्ध होने वाले खाने की ओर आकर्षित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि कूड़ेदानों में उपलब्ध खाने की समस्या का हल करने की जरूरत है। इसके बाद बंदरों को वनों की ओर भेजा जाएगा लेकिन वनों में भी उनके लिए पर्याप्त भोजन हो इस सबके लिए प्रयास किए जा रहे हैं।

बंदर ही नहीं जंगली सूअर, नील गाय का भी आतंक

वन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव तरूण कपूर का कहना है कि बंदरों के अलावा नील गाय और जंगली सूअर भी फसलों को बर्बाद कर रहे हैं। प्रदेशवासियों की मांग पर इन्हें वर्मिन घोषित करने की मांग भारत सरकार से की गई है। इन जानवरों की समस्या का समाधान इन्हें मारकर ही संभव है क्योंकि इनकी नसबंदी करना काफी मुश्किल है। भारत सरकार ने प्रदेश सरकार से नील गाय और जंगली सूअरों की गणना करने को कहा है और उसके बाद ही इन्हें वर्मिन घोषित करने पर कोई निर्णय लिया जाएगा। भारत सरकार के निर्देशों के बाद इनकी गणना की जा रही है जो करीब डेढ़ माह में पूरी होगी। गणना पूरी होने के बाद रिपोर्ट भारत सरकार को सौंप दी जाएगी और उम्मीद है कि भारत सरकार इन्हें वर्मिन घोषित करेगी।

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