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विचारों व भावों को अभिव्यक्त करते भित्ति चित्र

विचारों व भावों को अभिव्यक्त करते भित्ति चित्र

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Murals: चित्रकला कला के सर्वाधिक कोमल रूपों में से एक है जो रेखा और वर्ण के माध्यम से विचारों तथा भावों को अभिव्यक्ति देती है। इतिहास का उदय होने से पूर्व कई हजार वर्षों तक जब मनुष्य मात्र गुफा में रहा करता था, उसने शैलाश्रय चित्र बनाए। भारतीय चित्रकला के साक्ष्य मध्य भारत की कैमूर शृंखला, विंध्य पहाडियों और उत्तर प्रदेश के कुछ स्थानों की कुछ गुफाओं की दीवारों पर मिलते हैं। ये चित्रकलाएं वन्य जीवों, युद्ध के जुलूसों और शिकार के दृश्यों का आदिम अभिलेख हैं। हड़प्पन संस्कृति की सामग्री की सम्पदा को छोड़ दें तो भारतीय कला कई वर्षों के लिए समग्र रूप से हमारी दृष्टि से ओझल हो जाती है। भारतीय कला की खाई को अभी तक संतोषजनक रूप से भरा नहीं जा सका है । प्राम्भिक भित्ति चित्रकला को महाराष्ट्र के औरंगाबाद के निकट स्थित अजन्ता के चित्रित किए गए गुफा मन्दिरों की ही भांति, बौद्ध कला की की चित्रशालाओं का आदि पुरुष माना जा सकता है। अजन्ता की गुफा सं. नौ और दस में प्राचीनतम चित्रकलाएं हैं जिनमें से एकमात्र बची चित्रकला गुफा दस की बाईं दीवार पर एक समूह है।

इसमें एक राजा को अपने परिचरों के साथ पताकाओं से अलंकृत एक वृक्ष के समक्ष चित्रित किया गया है। राजा पवित्र बोधिवृक्ष तक राजकुमार से जुड़ी किसी मन्नत को पूरा करने के लिए आया है। राजकुमार राजा के निकट ही खड़ा है । यह खण्डित चित्रकला संरचना और निष्पादन दोनों ही क्षेत्रों की एक सुविकसित कला को दर्शाती है जिसे परिपक्वता के इस चरण तक पहुंचने में कई शताब्दियां अवश्य लग गई होंगी। ‘मरणासन्न राजकुमारी’ कहलाने वाली के दृश्य को गुफा सं. 16 में सचित्र प्रस्तुत है जिसे पांचवीं शताब्दी ईसवी सन् के प्रारम्भिक भाग में तैयार किया गया था ।


कहानी यह बताती है कि कैसे भगवान बुद्ध नन्द को, इस कन्या से छुड़ा कर स्वर्ग में ले जाते हैं, जो उससे भावपूर्ण रूप से प्यार करती है । यह अजन्ता की सर्वाधिक असाधारण चित्रकलाओं में से एक है क्योंकि रेखा का संचलन अचूक और निश्चल है । छठीं शताब्दी की गुफा सं. दस में उड़ती हुई अप्सराएं हैं । इस युग की विशेषता समृद्ध अलंकरण को उनकी मोतियों और फूलों से सजी पगड़ी में सुन्दरता से चित्रित किया गया है। कलाकारों ने समस्त वनस्पतियां तथा जीव-जंतुओं को पूरी निष्ठा से चित्रित किया गया है लेकिन हमें रूप एवं वर्ण की कोई भी पुनरावृत्ति कहीं भी देखने के लिए नहीं मिलती है । अजन्ता के कलाकारों ने अपनी बोधगम्यता, मनोभाव और कल्पनाशक्ति को मुक्त कर दिया है। मध्य प्रदेश की बाघ गुफाओं की चित्रकलाएं अजन्ता की गुफा सं. एक और दो की चित्रकलाओं के जैसी ही हैं, लेकिन ये अजन्ता की तुलना में अधिक सांसारिक और मानवीय हैं ।

अभी तक ज्ञात प्राचीनतम ब्राह्मणीय चित्रकलाएं अपने खण्डित रूप में बादामी गुफाओं में गुफा सं. तीन में पाई जाती हैं तथा इनका संबंध लगभग छठीं शताब्दी से है । तथाकथित शिव और पार्वती कुछ भली-भांति संरक्षित रूप में पाए जाते हैं ।येअभिव्यक्ति में कहीं अधिक संवेदनशील हैं और खाका कोमल तथा लचीला है । भित्तिचित्र की आगामी शृंखला ऐलोरा में जीवित रूप में मिलती है, जो कि अत्यधिक महत्‍त्व और पवित्रता का एक स्थल है ।

ऐलोरा की चित्रकलाओं की सर्वाधिक महत्‍त्वपूर्ण लाक्षणिक विशेषताएं हैं- सिर को असाधारण रूप से मोड़ना, भुजाओं पर चित्रित किए गए कोणीय मोड़, तीखी नाक और बड़े-बड़े नेत्र जिनसे भारतीय चित्रकला की मध्यकालीन विशेषता को भली-भांति समझा जा सकता है। दक्षिण भारत में सर्वाधिक महत्‍त्वपूर्ण भित्तिचित्र तंजौर, तमिलनाडु में हैं । तंजौर के राजराजेश्वर मन्दिरों में नृत्य करती हुई आकृतियों का संबंध ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ से है तथा ये मध्यकालीन चित्रकलाओं का सुन्दर उदाहरण हैं सभी आकृतियों के पूरी तरह से खुले हुए नेत्र, झुके आधे खुले हुए नेत्रों का संचलन जीवन-शक्ति के स्पन्दन से परिपूर्ण हैं। तंजावुर के बृहदीश्वर मन्दिर की नृत्य करती हुई युवती जिसमें बाईं टांग दृढ़तापूर्वक आधार पर टिकी हुई और दाहिनी टांग हवा में है । नाक और ठोढ़ी तीखी हैं, जबकि नेत्र पूरा खुला है। हाथ दूर तक फैले हुए हैं । भारत में भित्तिचित्र की अन्तिम शृंखला हिन्द पुर के निकट लेपाक्षी मन्दिर में पाई जाती हैं तथा इसका संबंध सोलहवीं शताब्दीं से है।

इसमें शैव तथा धर्मनिरपेक्ष विषयों को चित्रित किया गया है। केरल में त्रावणकोर के राजकुमार के शासनकाल में, राजस्थान में जयपुर के राजमहलों में और हिमाचल प्रदेश में चम्बा राजमहल के रंगमहल में गिरावट की इस अवधि के कुछ भित्तिचित्र उल्लेखनीय हैं। चम्बा के रंगमहल की चित्रकलाओं पर इस संबंध में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ की यह चित्रकला अपने मूल रूप में राष्ट्रीय संग्रहालय के पास हैं। भारतीय भित्तिचित्रों के निर्माण की तकनीक तथा प्रक्रिया अलग ही थी। धरती पर चूना पलस्तर की एक अत्यधिक पतली परत से लेप किया गया और उसके ऊपर जलरंगों से चित्रकलाएं चित्रित की गई हैं ।

वास्तविक भित्तिचित्र पद्धति का अनुसरण करते हुए दीवार की सतह जब गीली होती है तब चित्र बनाए जाते हैं ताकि रंगद्रव्य दीवार की सतह में अन्दर गहराई तक चले जाएं । जबकि भारतीय चित्रकला के अधिकांश मामलों में चित्रकला की जिस अन्य पद्धति का पालन किया गया था उसे सांसारिक या भित्तिचित्र के रूप में जाना जाता है । यह चूने के पलस्त‍र से की गई सतह पर चित्रकला करने की एक पद्धति है जिसे पहले सूखने दिया जाता है और फिर चूने के ताजे पानी से भिगोया जाता है । इस प्रकार से प्राप्त सतह पर कलाकार अपनी रचना का सृजन करता है । एक अनुभवी हाथ ने इस प्रथम खाके को खींचा था और अन्तिम आरेखण के समय एक सुघड़ श्याम या गहरी भूरी रेखा से कई स्थानों पर बाद में सुधार किए गए थे। मुख्य रूप से गैरिक लाल, चटकीला लाल (सिंदूरी) गैरिक पीला, जम्बुकी नील, लाजवर्द, काजल, चाक सफेद, एकवर्ण और हरे रंग का प्रयोग किया गया था ।

सहेलियां…एक छोटी सी मुलाकात

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