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नटराज शिव : आदि नट व परम नर्तक

नटराज शिव : आदि नट व परम नर्तक

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शिव आदि नट व परम नर्तक हैं इसीलिए ‘नटराज’ कहलाते हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही उनकी नृत्यशाला है। संसार में अणु से लेकर बड़ी-से-बड़ी शक्ति में जो स्पन्दन दिखाई पड़ता है, वह उनके नृत्य एवं नाद का ही परिणाम है। उनका नृत्य जब प्रारम्भ होता है, तब उनके नृत्य-झंकार से सारा विश्व मुखर और गतिशील हो उठता है और जब नृत्य-विराम होता है, तब समस्त जगत शान्त और आत्मानन्द में निमग्न हो जाता है।

चतुर्भुज नटराज के एक हाथ में रजोगुण का प्रतीक डमरू है, जो समस्त जीव-जगत की सृष्टि करता है और उनके दूसरे हाथ में तमोगुण की प्रतीक अग्नि है, जिससे वे मानवीय आत्मा के बंधनों का संहार करते हैं। उनका एक चरण भूमि पर है जिससे वे माया, मोह और अविद्या को दबाये रहते हैं और दूसरे उठे हुए पैर से संकटों से त्रस्त प्राणियों को मुक्ति देते हैं। आकाश उनका शरीर है। दिशाएं उनकी भुजाएं हैं और भुजाओं पर लिपटा हुआ सर्प काल का प्रतीक है। सूर्य, चन्द्र और अग्नि उनके तीनों नेत्र हैं। देवी गौरी को रत्नखचित सिंहासन पर बैठाकर भगवान शंकर प्रदोषकाल में डमरु बजाते हुए आनन्दातिरेक में मग्न होकर जगत को आह्लादित करने के लिए नृत्य करते हैं।
नटराज शिव द्वारा प्रवर्तित नृत्य के अनेक प्रकार हैं, जिनमें, एक है ‘तांडव’ और दूसरा है ‘लास्य’। तांडव शिव का नृत्य है–उद्धत और आकर्षक। लास्य पार्वती का नृत्य है–सुकुमार तथा मनोहर। कहते हैं – शिव ने त्रिपुरदाह के बाद उल्लास-नृत्य किया था। उल्लास के अतिरेक में उनके उन्मुक्त नृत्य से नभमण्डल विक्षुब्ध हो गया था, दिशाएं चटपटा उठीं थीं, धरती धसकने लगी थी। शिवजी के तृतीय नेत्र से अग्नि के कण निकलने लगे। अत: लोकों के जल जाने के भय से वे अपनी दृष्टि को बंद करके निर्बाध नाचते ही गए। उन्हें संयत करना आवश्यक समझ भगवती पार्वती ने लास्य-नृत्य किया। ताण्डव-नृत्य भावशून्य था और लास्य-नृत्य रस और भाव से पूर्ण था। इसी ताण्डव एवं लास्य-नृत्य के समन्वय से सृष्टि का विस्तार हुआ। शास्त्रों में उल्लेख है कि नटराज शिव द्वारा संध्याताण्डव के समय ब्रह्मा ताल देते हैं, सरस्वती वीणा बजाती हैं, इन्द्र बाँसुरी और विष्णु मृदंग बजाते हैं, लक्ष्मी गान करती है और सभी देवता नृत्य देखते हैं। इस नृत्य में मृदंग, भेरी, पटह, भाण्ड, डिंडिम, पणव, दर्दुर, गोमुख आदि वाद्यों का प्रयोग हुआ था।


तेजोमय नीलकंठ

भगवान शिव सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से शिव को भिन्न माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं। शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। भगवान शिव का अर्धनारीश्वररूप जगत्पिता और दयामयी जगन्माता के आदि सम्बन्ध को दर्शाता है। सत्-चित् और आनन्द–ईश्वर के तीन रूप हैं। इनमें सत्स्वरूप उनका मातृस्वरूप है, चित्स्वरूप उनका पितृस्वरूप है और उनके आनन्दस्वरूप के दर्शन अर्धनारीश्वररूप में ही होते हैं।

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