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नव संवत्सर…वसंत ऋतु से प्रारंभ,वसंत ऋतु पर ही समाप्त

नव संवत्सर…वसंत ऋतु से प्रारंभ,वसंत ऋतु पर ही समाप्त

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nav samvatsar: सभी ऋतुओं के पूरे एक चक्र को संवत्सर कहा जाता है। अमरकोष में यही व्याख्या है कि किसी ऋतु से आरंभ करके ठीक उसी ऋतु तक पुनः आने में जितना समय लगता है उस कालमान को संवत्सर कहा जाना चाहिए। ऋतु ही काल की गति है और ऋग्वेद में चंद्रमा को ऋतुओं का निर्माणकर्ता बताया गया है, इसीलिए भारतीय संवत्सर के लिए चंद्र संवत्सर को प्रमुखता दी गई है। चंद्र संवत्सर चैत्रमास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होकर चैत्रमास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक प्रभावी  होता है। हम कह सकते हैं कि वसंत ऋतु से प्रारंभ होने वाला यह संवत्सर सभी ऋतुओं की परिक्रमा करते हुए वसंत ऋतु में ही जाकर समाप्त होता है। कहते हैं कि  चैत्रमास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि को सूर्योदय से ही ब्रह्मा ने सृष्टि के निर्माण का कार्य शुरू किया था।


nav samvatsar: भगवान विष्णु ने लिया था मत्यावतार 

इसी दिन भगवान विष्णु के मत्यावतार लेने की बात भी कही गई है। कहते हैं अति प्राचीन वैदिक काल से इसे महापर्व के रूप में मनाया जाता रहा है। इसी के महत्व को मानकर सम्राट विक्रमादित्य ने भी अपने संवत्सर का आरंभ लगभग 2000 साल पहले चैत्रशुक्ल प्रतिपदा को ही किया। इसे सर्वोत्तम तिथि माना गया है। इसी दिन से धार्मिक,सामाजिक,व्यावहारिक और राजनीतिक महत्व के कार्य आरंभ किए जाते हैं। संवत्सर का पूजन,नवरात्र घट स्थापन और ध्वजा रोपण जैसे काम इस दिन किए जाते हैं। चैत्र ही एक ऐसा माह है जिसमें वृक्ष और लताएं पुष्पित और पल्लवित होती हैं।

nav samvatsar: संवत्सर पूजन की विधि

  • स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें । निवास स्थान को ध्वजा,पताका, तोरण और वंदनवार आदि से सजाएं। हाथ में गंध,पुष्प
    ,अक्षत तथा जल लेकर संकल्प करें। स्वच्छ चौकी पर हल्दी या केसर से रंगे चावलों से अष्ट दल वाला कमल बनाएं। उस पर ब्रह्मा जी की मूर्ति  स्थापित कर आवाहन करें -ओम् ब्रह्मणे नमः
  • इसके बाद घर में स्थापित सभी देवताओं का पूजन करें।
  • इस दिन नए वर्ष का पंचांग फल सुना जाता है ।
  • द्वार देश और देवी पूजा के स्थान जल कलश की स्थापना करें। इस दिन  नवरात्रि के प्रारंभ से रामनवमी तक दुर्गापूजा का प्रावधान विशेष रूप से रहता है।

संवत की शुरुआत नवरात्र से ही इस लिए होती है क्योंकि सृष्टि के आरंभ से पहले चारों ओर अंधकार का साम्राज्य था । उस समय आदिशक्ति कूष्मांडाके रूप में वनस्पतियों और सृष्टि की रचना के लिए आवश्यक सामग्री लेकर सूर्यमंडल में विराजमान थीं।  और इन्होंने ही ब्रह्मा,विष्णु महेश की रचना की । इसके बाद सत,रज और तम गुणों से तीन देवियों को उत्पन्न किया जो कि सरस्वती ,लक्ष्मी और काली के रूप में अवतरित हुईं। सृष्टि चलाने में सहायता करने के लिए आदि शक्ति ने ब्रह्मा को सरस्वती, विषणु को लक्ष्मी और शिव को देवी काली को सौंप दिया। इन्हीं के सहयोग से सृष्टि का संचालन चला  इसी लिए सृष्टि के आरंभ की तिथि से नौ दिनों तक आदि शक्ति को नौ रूपों की पूजा होती है।

धान्य की अधिष्ठात्री मां अन्नपूर्णा

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