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शहीद की बेटी का दर्द : सरकारें सिर्फ दावे करती हैं कार्रवाई नहीं

शहीद की बेटी का दर्द : सरकारें सिर्फ दावे करती हैं कार्रवाई नहीं

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Naxal Attack himachal Young Martyrs : चचियां। सरकारें सिर्फ दावे करती हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं। अगर कार्रवाई की जाती तो हमारे वीर सैनिकों पर बार बार हमले नहीं होते और न ही हमारे वीर सैनिक शहीद होते। यह कहना है नक्सली हमले में शहीद हुए एएसआई संजय कुमार शर्मा की बड़ी बेटी अमीषा शर्मा का। शहीद की बेटी को अपने पिता से बिछड़ने का बहुत अफसोस है लेकिन उससे भी ज्यादा उसे सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गुस्सा है। अमीषा का कहना है कि जब कभी कोई हमला होता है और सैनिक शहीद होते हैं तो हमारे देश के नेता बड़े-बड़े बयान देते हैं, लेकिन असल में होता कुछ नहीं है।

एक हफ्ते के बाद सब भूल जाएंगे कि कौन शहीद हुए

आज ओर कल तक सब जगह इसपर चर्चा होगी, लेकिन एक हफ्ते के बाद सब भूल जाएंगे कि कहीं कोई नक्सली हमला हुआ था और कई सैनिक शहीद हुए थे। अमीषा ने गुस्से से तमतमाते हुए कहा कि सरकारों के नुमाइंदे बंद कमरों में बैठकें करके नीतियां बनाते हैं और हमलों के बाद अफसोस जाहिर करते हैं। एक बार वह नेता भी उन जंगलों में जाकर देखें कि आखिर यह हमले रुक क्यों नहीं रहे और आखिरकार चूक कहां हो रही है। अमीषा का कहना है कि इस बार भी सरकार के नुमाइंदे कार्रवाई की बात कर रहे हैं और वह चाहती हैं कि कार्रवाई जरूर हो। यदि पहले की तरह कोई कार्रवाई नहीं हुई तो वह सरकार के नुमाइंदों से हिसाब जरूर पूछेंगी।


आखिरी बार 11 अप्रैल को की थी  पापा से बात 

अमीषा ने बताया कि उसने आखिरी बार 11 अप्रैल को अपने पापा से बात की थी। वह अपने पापा से बहुत ज्यादा डरती हैं और ज्यादा बात नहीं करती है। पापा ने उसे अच्छे से पढ़ाई करने के बारे में कहा था। शहीद संजय कुमार चार भाई बहनों में सबसे छोटे थे। उनकी दो बेटियां हैं। बड़ी बेटी अमीषा शर्मा जमा एक की छात्रा है, जबकि छोटी बेटी कशिश शर्मा 7वीं कक्षा की छात्रा है। उनके 83 वर्षीय पिता राजेन्द्र प्रसाद शर्मा सीआरपीएफ से सेवानिवृत्त हैं और पिछले करीब 7 माह से ब्रेन हैमरेज से पीड़ित हैं। उनकी 75 वर्षीय माता शकुंतला देवी चाहकर भी अपने आंसू नहीं रोक पा रही हैं। उनके बड़े भाई विजय कुमार ने बताया कि संजय होली के दौरान घर पर आए थे। उनकी शहादत की खबर उनके परिवार को देर रात करीब डेढ़ बजे मिली। विजय का कहना है कि शहादत किसी भी सैनिक का सपना होता है लेकिन इस तरह के कायरतापूर्ण हमलों में हम कब तक अपने वीर जवानों को खोते रहेंगे। शहीद संजय का पार्थिव शरीर कुछ देर बाद उनके गांव में पहुंचने की उम्मीद है। गांव के हर तरफ लोग एकत्रित हैं और शहीद की देह पहुंचने का इंतज़ार कर रहे हैं।

मेरे पापा मुझे छोड़कर नहीं जा सकते

शहीद संजय कुमार शर्मा की छोटी बेटी कशिश खुद को संभाल नहीं पा रही। चीख चीखकर वह एक ही बात कह रही है कि उसके पापा उसे छोड़कर नहीं जा सकते। दोनों बहनों की चीखें सुनकर हर आंख नम हो रही है। दोनों बच्चियां कभी एक दूसरे को चुप करवाने की कोशिश कर रही हैं तो कभी अपने दादा ओर दादी को हौसला दे रही है लेकिन खुद को संभालने का प्रयास करने की तमाम कोशिशों के बाद भी इन मासूमों की चीखें सारे माहौल को आंसुओं में डुबो रही हैं। शहीद संजय के बीमार पिता राजिंदर प्रसाद शर्मा बिस्तर से उठकर घर के आंगन में आ गए हैं, लेकिन बेटे की मौत के गम को वह छुपा नहीं पा रहे। वहीं शहीद संजय की माता शकुंतला देवी बेसुध सी हैं। जरा सा होश में आने के बाद वह संजय को पुकार रही हैं और फिर से बेसुध हो जा रही हैं।

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