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कोटरोपी त्रासदीः रेस्ट हाउस, पटवारघर, क्वार्टरों में कट रही बेघरों की जिंदगी

कोटरोपी त्रासदीः रेस्ट हाउस, पटवारघर, क्वार्टरों में कट रही बेघरों की जिंदगी

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मंडी। कोटरोपी त्रासदी को आज एक साल पूरा हो गया। आज के दिन आधी रात को एक ऐसी अनहोनी घटी, जिसका अंदाजा शायद ही किसी ने लगाया होगा। देखते ही देखते 48 लोग मौत के मुंह में चले गए। वहीं, 8 परिवार इसी दिन बेघर हुए थे। इनके घर व उपजाउ भूमि मलबे में दब गई थी।

जिन परिवारों के 48 लोग इस हादसे में मारे गए थे, उनके जख्म शायद ही कभी भर पाएंगे। अपनों को खोने का दुख हमेशा उनके मन में रहेगा। वहीं, बेघर हुए 8 परिवार भी आज तक चैन की नींद नहीं सो पाएं हैं। इसे सरकारी बेरूखी ही कहेंगे कि एक साल बाद भी इन लोगों जमीने व घर मुहैया नहीं हो पाएं हैं।


कोटरोपी गांव के आठ परिवार हुए थे बेघर

इस भू-स्खलन में कोटरोपी गांव के 8 परिवार घर से बेघर हुए। हादसे में इनके आशियाने मलबे में दब गए और इन्हें खुले आसमान के नीचे लाकर खड़ा कर दिया। इसके अलावा 5 ऐसे परिवार भी थे, जिनकी सिर्फ जमीनें इस मलबे की भेंट चढ़ी। उस वक्त सरकार ने फौरी राहत के तौर पर आर्थिक सहायता, कुछ जरूरी सामान और रहने के लिए कुछ अस्थायी स्थान इन्हें दे दिए। आपको जानकर हैरानी होगी कि बीते एक वर्ष ये 8 परिवार उन्हीं अस्थायी ठीकानों पर अपना जीवन बसर कर रहे हैं।

कोई पटरवारघर में तो कोई रेस्ट हाउस में शरण लिए हुए है। कुछ ने तो मजबूरी में क्वार्टर तक ले लिए हैं। लेकिन, सरकार ने आज दिन तक इनकी इस समस्या की तरफ नहीं सोचा और इन्हें जमीनें दिलाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। प्रभावित रामकली, सोमा देवी, मान चंद, चोबे राम और नारायण दास ने बताया कि उन्होंने जमीनों और आशियानों के लिए एसडीएम से लेकर सीएम तक गुहार लगाई। लेकिन, किसी ने इनकी फरियाद नहीं सुनी।

हर जगह से एक ही जबाव आया कि काम जल्दी ही हो जाएगा और ऐसा बोलते-बोलते एक वर्ष बीत गया। प्रभावितों का कहना है कि सरकार ने कोटरोपी में मिट्टी को पलटने के लिए करोड़ों रूपए खर्च कर दिए लेकिन प्रभावितों की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। वहीं, जब इस बारे में एसडीएम पधर आशीष शर्मा से बात की गई तो उन्होंने बताया कि यह मामला सरकार को भेजा गया है और अभी तक उन्हें सरकार की तरफ से कोई जबाव नहीं आया है।

क्या हुआ था एक साल पहले

12 और 13 अगस्त 2017 की रात को हिमाचल के इतिहास का सबसे बड़ा भू-स्खलन हुआ था। उस काली रात ने एक ही झटके में 48 लोगों को मौत की नींद सुला दिया था। इस हादसे में यहां के स्थानीय 8 परिवार घर से बेघर हो गए और 5 अन्य लोगों की कीमती जमीनें पहाड़ी से आए मलबे के साथ बह गई। समय रात करीब 12:15 बजे।

एचआरटीसी की दो बसें पहाड़ी से नीचे वाली सड़क से होकर गुजरने लगी। एक बस मनाली से कटड़ा जा रही थी और दूसरी बस चंबा से मनाली जा रही थी। जैसे ही यह बसें पहाड़ी के नीचे पहुंची तो पहाड़ी दरक गई। मनाली से कटड़ा जा रही बस के आगे वाले हिस्से पर मलबा गिरा और बस के अंदर बैठे तीन लोग मलबे की चपेट में आ गए। इसके साथ ही बस से आगे चल रही एक बाइक भी इसकी चपेट में आई थी। एक अन्य कार भी इसकी चपेट में आई थी। लेकिन, कार चालक पूरी तरह से सुरक्षित बच गया।

चंबा मनाली बस पहाड़ी से आए मलबे के साथ ही बह गई थी। इसमें 45 यात्री सवार थे, जिनमें से कोई भी जिंदा नहीं बच सका। उत्तर प्रदेश से हिमाचल घूमने आए 15 लोग इस हादसे में मारे गए। इन्हें अंतिम समय में भी अपने घर की मिट्टी नसीब नहीं हुई और सभी शवों का जोगिंद्रनगर में अंतिम संस्कार किया गया।

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