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एक छोटा सा केंचुआ कैसे रोक सकता है बाढ़, जानिए

एक छोटा सा केंचुआ कैसे रोक सकता है बाढ़, जानिए

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पालमपुर। एक छोटा सा केंचुआ (Earthworm) बाढ़ (Flood) को रोक सकता है। जी हां यह हम नहीं कह रहे बल्कि यह कहना पद्मश्री सुभाष पालेकर (Padmashree Subhash Palekar) का। सुभाष पालेकर ने कृषि विभाग पालमपुर (Agriculture Department Palampur) में आयोजित प्राकृतिक खेती पर प्रशिक्षण के चौथे दिन सत्र में यह जानकारी किसानों को दी। उन्होंने देसी केंचुओं (Earthworm) के महत्व के बारे में बताया तथा कहा कि देसी केंचुए (Earthworm) गहरी भूमि में से मिट्टी खाकर खनिज तत्व को अपने साथ ऊपर लाते हैं और इसके बाद विष्ठा के रूप में जमीन सतह पर छोड़ देते है और एक नया छेद बनाकर दोबारा गहरी भूमि में चले जाते हैं।


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इस प्रकार एक केंचुआ (Earthworm) दिन में कई बार ऊपर नीचे आता जाता है और यह प्रक्रिया दिन के 24 घंटे और साल में 365 दिन चलती रहती है। इस प्रक्रिया से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। इसके साथ- साथ भूमि में अनंत करोड़ सूक्ष्म छेद बन जाते हैं, जोकि बरसात के पानी को सोख लेते हैं। बरसात का सारा का सारा पानी भूमि में समा जाता है और बाढ़ नहीं आती है ओर भूमि का जलस्तर भी बढ़ जाता है। इस सारी प्रक्रिया से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है।|

संसार में केवल सबल को ही जीने का अधिकार

पद्मश्री सुभाष पालेकर (Padmashree Subhash Palekar) ने यह भी बताया कि भूमि में नमी बनाए रखने तथा केंचुआ (Earthworm) की संख्या बढ़ाने और जीवाणुओं की संख्या बनाए रखने के लिए अच्छादन का महत्वपूर्ण योगदान है। अच्छादन की चार विधियां हैं। मृदा आच्छादन, कास्ट अच्छादन, संजीव अच्छादन व मिश्रित फसलें। उन्होंने कहा कि मृदा अच्छादन से भूमि में हवा संचालन वर्षा जल संग्रह एवं खरपतवार नियंत्रण किया जाता है। उन्होंने बताया कि भूमि की 4.5 इंच की मिट्टी की सतह में 88 से 92 फीसदी सूक्षम जीवाणु और 95 फीसदी सूक्षम में जड़े होती हैं, इससे ह्यूमस का निर्माण होता है। पद्मश्री सुभाष पालेकर (Padmashree Subhash Palekar) ने किसानों को बताया कि संसार में केवल सबल को ही जीने का अधिकार है। यह ईश्वरी व्यवस्था है, जिससे कि कमजोर पौधों की प्रजातियां खत्म हो जाती हैं और सबल पौधे ही बचे रहते हैं, ताकि जैव विविधता बनी रहे।

 

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