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Police बेसहारा मनोरोगियों के बारे में High Court के Orderभी नहीं मानती

Police बेसहारा मनोरोगियों के बारे में High Court के Orderभी नहीं मानती

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शिमला। उमंग फाउंडेशन के अध्यक्ष  अजय श्रीवास्तव ने  आरोप लगाया है कि पुलिस सड़क पर बेसहारा घूमने वाले मनोरोगियों के बारे में हिमाचल हाईकोर्ट के आदेश को भी नहीं मानती।हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका (CWPIL 18/2011) पर 4 जून 2015 को दिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में राज्य के सभी पुलिस अधीक्षकों को मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 1987 का सख्ती से पालन करने के आदेश दिए थे।


  • उमंग फाउंडेशन का आरोप, अधिनियम 1987 का सख्ती से पालन करने का था आदेश
  • बेसहारा घूमने वाले मनोरोगी 24 घंटे के भीतर  न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश नहीं किए

हालांकि, प्रदेश के मुख्य सचिव वीसी फारका ने उमंग फाउंडेशन के साथ एक बैठक में स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार संविधान, कानून और हाईकोर्ट के आदेशों का कड़ाई से पालन कराएगी। उन्होंने कहा कि बेसहारा घूमने वाले मनोरोगियों को संरक्षण, सुरक्षा, इलाज और पुनर्वास उपलब्ध कराना उनकी निजी प्राथमिकता रहेगी। श्रीवास्तव ने कहा कि न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति त्रिलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने 4 जून 2015 को दिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में सभी जिला पुलिस अधीक्षकों को आदेश दिया था कि वे मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 1987 की धारा 23 और 24 का सख्ती से पालन करें।

धारा 23 में कहा गया है कि यह हर पुलिस थाना प्रभारी का दायित्व होगा कि वह अपने थाना क्षेत्र में बेसहारा इधर-उधर घूमने वाले मनोरोगी को  अपने संरक्षण में लेकर 24 घंटे के भीतर  निकटतम  न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश करेगा। इसके बाद  धारा 24 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट मनोरोगी व्यक्ति को मनोचिकित्सा के लिए अस्पताल भेजने के आदेश पारित कर सकता है। उल्लेखनीय है कि ऐसे मामलों में इलाज का पूरा खर्च सरकार उठाती है। ठीक होने के बाद मनोरोगी यदि अपने परिवार वालों का पता बताता है तो उसे सरकारी खर्चे पर उसके घर भेजने का भी कानूनी प्रावधान है। यदि ठीक होने के बाद वह किसी कारण से अपने घर नहीं लौट सकता है तो सरकार को उसके पुनर्वास केंद्र में रहने का प्रबंध करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से प्रदेश में कुछ अपवादों को छोड़कर बेसहारा मनोरोगियों  से संबंधित मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम के प्रावधानों का पालन बिल्कुल नहीं किया जा रहा। उन्होंने  बताया कि वह  कई जिला पुलिस अधीक्षकों  को  बेसहारा मनोरोगियों की जानकारी दे चुके हैं, परंतु पुलिस को कोई परवाह नहीं है। इससे सड़कों पर बेसहारा रहने वाले मनोरोगियों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है और यह हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेशों की खुलेआम अवमानना का मामला भी है।

श्रीवास्तव ने राज्य के मुख्य सचिव वीसी फारका के साथ हुई बैठक को संतोषजनक बताया। उन्होंने कहा, कि मुख्य सचिव ने आश्वासन दिया है कि कानूनी प्रावधानों और हिमाचल प्रदेश के हाईकोर्ट के आदेशों का पूरी तरह पालन करने के निर्देश जारी किए जा रहे हैं। उन्होंने उमंग फाउंडेशन के  कार्यों की  सराहना करते हुए कहा कि सरकार उसकी अन्य मांगों पर सहानुभूति पूर्वक विचार करेगी। इनमें पुलिस विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों को संबंधित कानूनों और अदालती फैसलों की जानकारी देना, आम जनता तथा विद्यार्थियों को मनोरोगियों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए जागरुकता अभियान चलाना, पुलिस थाना स्तर पर स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से  मनोरोगियों की पहचान करना  एवं हर थाने में  मनोरोगी से संबंधित  मामलों  को देखने के लिए एक अधिकारी को दायित्व देना शामिल है।

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