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चुनौतीः जीत किसी की भी हो, परीक्षा सत्ता संभालने के बाद होगी

चुनौतीः जीत किसी की भी हो, परीक्षा सत्ता संभालने के बाद होगी

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प्रदेश की माली हालत और बढ़ते कर्ज को कम करना आने वाली सरकार के लिए एक बड़ा चैलेंज

शिमला। चुनावी समर में भले ही जीत का सेहरा किसी के भी सिर सजे, लेकिन उसकी पहली चुनौती राज्य की माली हालस को सुधारना होगा। राज्य को कर्ज के दलदल से कैसे बाहर निकालना है और कैसे कर्ज का बोझ कम किया जाए, वह सबसे बड़ी परीक्षा होगी। प्रदेश की आर्थिक स्थिति साल दर साल खराब हो रही है। इस वक्त राज्य पर 50 हजार करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज है और इसे चुकता कर पाना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं है। क्योंकि हिमाचल प्रदेश के पास अपने संसाधन नहीं हैं और बिजली उत्पादन की रायल्टी से भी उतना पैसा नहीं मिल रहा है कि उससे वह ऋण को चुकता कर सके। इसके लिए प्रभावी वित्त प्रबंधन की सख्त दरकार है।

राज्य में विकास कार्यों को गति देना हर सरकार की पहली प्राथमिकता रहती है। इसके लिए जैसे-तैसे जुगाड़ कर पैसा का प्रबंध किया जाता रहा है और यह क्रम आज भी जारी है। राज्य सरकार के कर्ज लेने की सीमा भी केंद्र सरकार ने तय कर रखी है और उस सीमा के करीब राज्य सरकार पहुंच गई है। राज्य सरकार ने इस वित्त वर्ष में अभी तक 2800 करोड़ रुपए का लोन ले लिया है और 500 करोड़ रुपए का लोन अगले सप्ताह मिलने वाला है। ऐसे में अब केवल इस वित्त वर्ष में सरकार केवल 100 करोड़ रुपए का ही लोन और ले पाएगी और इस राशि से न केवल कर्मचारियों और पेंशनरों का भुगतान करना है, बल्कि विकास की गति को भी बढ़ावा देना है।

उधर, अभी पंजाब के नए यानी छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट आना बाकी है और इसके आने से निश्चित तौर पर राज्य सरकार पर और अतिरिक्त भार पड़ने वाला है, क्योंकि हिमाचल के कर्मचारियों को वह पंजाब सरकार के वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करनी होती है। पंजाब में नए वेतन आयोग की सिफारिशें अगले वर्ष में किसी भी वक्त जारी की जा सकती हैं और वहां इसकी घोषणा होने से हिमाचल सरकार को भी अपनी जेब ढीली करनी पड़ेगी और कर्मचारियों को नया वेतनमान देना पड़ेगा। ऐसे में इस अतिरिक्त भार के लिए भी आने वाली सरकार को तैयार रहना होगा। 

बीजेपी-कांग्रेस को अपने वादे पूरे करने के लिए चाहिए अतिरिक्त धन

विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और बीजेपी ने राज्य की आर्थिक स्थिति को नियंत्रित करने को कई बातें कही हैं, लेकिन असलियत है कि सत्ता में आने को इन दोनों दलों ने ऐसे-ऐसे वादे किए हैं, जिसे पूरा करने के लिए अतिरिक्त धन की जरूरत रहने वाली है। अगर राज्य सरकार के आय की बात करें तो उसे केवल कर वसूली से पैसा मिलता है। इसके अलावा राज्य में पैदा होने वाली बिजली पर 12 फीसदी रायल्टी मिलती है, लेकिन इससे उतना पैसा एकत्र नहीं होता कि इससे वह कर्ज को चुकता कर सके। राज्य का मौजूदा वित्त वर्ष का बजट का 35783 करोड़ रुपए का है और इस राशि से न केवल विकास कार्य करवाना है, बल्कि कर्ज भी चुकाना है और राज्य के कर्मचारियों को वेतन भी देना है। ऐसे में जरूरत अब इस बात की है कि राज्य में कैसे वित्त प्रबंधन किया जाए और इसके लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति की है और देखना होगा कि राज्य की नई सरकार इस मोर्चे पर कैसे आगे बढ़ती है।

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