Expand

पोंगलः पुरानी चीजें छोड़ कुछ नया करने का पर्व

पोंगलः पुरानी चीजें छोड़ कुछ नया करने का पर्व

- Advertisement -

उत्तर भारत में जिन दिनों मकर सक्रांति का पर्व मनाया जाता है, उन्हीं दिनों दक्षिण भारत में पोंगल का त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार प्रतिवर्ष मकर संक्रान्ति के आस-पास मनाया जाता है। यह उत्सव लगभग तीन दिन तक चलता है । लेकिन मुख्य पर्व पौषमास की प्रतिपदा को मनाया जाता है । अगहन मास में जब हरे-भरे खेत लहलहाते हैं तो कृषक स्त्रियां अपने खेतों में जाती हैं। भगवान से अच्छी फसल होने की प्रार्थना करती हैं । इन्हीं दिनों घरों की लिपाई-पुताई प्रारम्भ हो जाती है । अमावस्या के दिन सब लोग एक स्थान पर एकत्र होते हैं । इस अवसर पर लोग अपनी समस्याओं का समाधान खोजते हैं । अपनी रीति-नीतियों पर विचार करते हैं और जो अनुपयोगी रीति-नीतियां हैं उनका परित्याग करने की प्रतिज्ञा की जाती है। जिस प्रकार 31 दिसंबर की रात को गत वर्ष को संघर्ष और बुराइयों का साल मानकर विदा किया जाता है, उसी प्रकार पोंगल को भी प्रतिपदा के दिन तमिलनाडुवासी बुरी रीतियों को छोड़ने की प्रतिज्ञा करते हैं। यह कार्य ‘पोही’ कहलाता है । जिसका अर्थ है- ‘जाने वाली’ । इसके द्वारा वे लोग बुरी चीजों का त्याग करते हैं और अच्छी चीजों को ग्रहण करने की प्रतिज्ञा करते हैं। पोही के अगले दिन अर्थात् प्रतिपदा को पोंगल की धूम मच जाती है । इस अवसर पर सभी छोटे-बड़े लोग काम में आने वाली नई चीजें खरीदते हैं और पुरानी चीजों को बदल डालते हैं । नए वस्त्र और नए बर्तन खरीदे जाते हैं। नए बर्तनों में दूध उबाला जाता है । खीर बनाई जाती है । लोग पकवानों को लेकर इकट्‌ठे होते हैं, और सूर्य भगवान की पूजा करते हैं । मकर सक्रान्ति से सूर्य उत्तरायण में चला जाता है दिन बड़े होने लगते हैं । सूर्य भगवान की कृपा होने पर ही फसलें पकती हैं । किसानों को उनकी वर्ष भर की मेहनत फल मिलता है । यह त्योहार तामिलनाडु का त्योहार अवश्य है पर इसके पीछे जो आध्यात्मिक संदेश छिपा है वह सम्पूर्ण भारतवासियों के लिए पवित्रता और नवोत्साह का संदेश देता है । इस त्योहार पर गाय के दूध के उफान को बहुत महत्व दिया जाता है।उनका विचार है कि जिस प्रकार दूध का उफान शुद्ध और शुभ है उसी प्रकार प्रत्येक प्राणी का मन भी शुद्ध संस्कारों से उज्ज्वल होना चाहिए । इसलिए वे अन्त:करण की शुद्धता के लिए सूर्यदेव से प्रार्थना करते हैं ।

भोगाली बीहू यानी आनंद और खाना

वैसे तो असम में तीन प्रकार के बीहू त्योहार होते हैं वैशाख बीहू, काति बीहू और भोगाली बीहू। ये सारे ही फसली त्योहार हैं। भोगाली बीहू – माघ महीने की संक्रांति के पहले दिन से माघ बीहू अर्थात भोगाली बीहू मनाया जाता है। इसका नाम भोगाली इसलिए रखा गया है कि इस दौरान खान-पान धूमधाम से होता है, क्योंकि तिल, चावल, नारियल, गन्ना इत्यादि फसल उस समय भरपूर होती है और उसी से तरह-तरह की खाद्य सामग्री बनाई जाती है और खिलाई जाती है। संक्रांति के पहले दिन को उरूका बोला जाता है और उसी रात को गांव के लोग मिलकर खेती की जमीन पर खर के मेजी बनाकर विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के साथ भोज करते हैं। उसमें कलाई की दाल खाना जरूरी होता है। उसी रात आग जलाकर लोग रात भर जागते रहते हैं और सुबह सूर्य उगने से पहले नदी, तालाब या किसी कुंड में स्नान करते हैं। स्नान के बाद खर से बने हुए मेजी को जला कर ताप लेने का रिवाज है। उसके बाद नाना तरह के पेठा, दही, चिवड़ा खाकर दिन बिताते हैं। उसी दिन पूरे भारत में संक्रांति, लोहड़ी, पोंगल इत्यादि त्योहार मनाया जाता है । भोगाली का नाम भोग से निकला है जिसका मतलब है आनंद और खाना । यह कटाई के मौसम के रूप में जाना जाता है । सभी लोग इस समय के दौरान दावत करते हैं और अच्छा खाना खाते हैं।

- Advertisement -

Facebook Join us on Facebook Twitter Join us on Twitter Google+ Join us on Google+ Instagram Join us on Instagram Youtube Join us on Youtube

RELATED NEWS

हिमाचल अभी अभी बुलेटिन

Download Himachal Abhi Abhi App Himachal Abhi Abhi IOS App Himachal Abhi Abhi Android App

राशिफल

Himachal Abhi Abhi E-Paper



सब्सक्राइब करें Himachal Abhi Abhi अलर्ट
Logo - Himachal Abhi Abhi

पाएं दिनभर की बड़ी ख़बरें अपने डेस्कटॉप पर

अभी नहीं ठीक है