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प्रवासी भारतीय दिवसः भाषण नहीं उन्हें स्वस्थ वातावरण दें 

प्रवासी भारतीय दिवसः भाषण नहीं उन्हें स्वस्थ वातावरण दें 

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अंग्रेजों के शासनकाल में हजारों भारतीय मजदूर उत्पादन कार्यों के लिए विदेशों में भेजे जाते थे उनकी कई पीढ़ियां वहीं गुजर गईं और आज हम पाते हैं कि विदेश की धरती पर मुश्किलों के बीच रहते हुए भी उन्होंने भारतीय सभ्यता और संस्कृति का निरंतर प्रचार-प्रसार किया है। वे जहां भी हैं वहां की अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग बन चुके हैं। इतना ही नहीं वे वहां की राजनीति और सरकार में भी अच्छी भूमिका निभा रहे हैं। रोचक यही है कि 100 से अधिक देशों में संपन्नता के साथ रहने वाले इन भारतीयों को अपने पूर्वजों की धरती अब भी आकर्षित करती है।
प्रवासी भारतीय दिवस, महात्मा गांधी की वतन वापसी से जुड़ा है। 9 जनवरी, 1915 को दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस लौटे थे। इस दिवस को मनाने की शुरुआत 2003 से हुई। यह संकल्पना लक्ष्मीमल्ल सिंधवी की थी। भारत विश्व का सबसे बड़ा डायस्पोरा है। प्रवासी भारतीय समुदाय अनुमानतः 2.5 करोड़ से भी अधिक है, जो पूरे विश्व के हर क्षेत्र में फैला हुआ है। हालांकि इसके पीछे व्यापार, उपनिवेशवाद और वैश्वीकरण जैसे कारक ही रहे। फिर धीरे-धीरे नया प्रवासी समुदाय उभरा है, जिसमें कुशल व्यापारी और अर्द्ध कुशल कामगार हैं जो पश्चिम और दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर काम करने जा रहे हैं। गौरतलब है कि प्रवासी समुदाय को किसी एक वर्ग में नहीं रखा जा सकता। यह एक विविध जातीय, मिलनसार वैश्विक समुदाय है जो कितने ही धर्मों, भाषाओं, मान्यताओं और संस्कृतियों से मिलजुल कर बना है।
इस आयोजन का मूल उद्देश्य भारत और भारतीय प्रवासियों के बीच एक संबंध स्थापित करना है। चाहा यही गया था कि यह ऐसा मंच बने जिसके द्वारा विभिन्न क्षेत्रों से आए हुए प्रवासी अपने अनुभवों को यहां के लोगों से साझा करें और लोगों को सक्षम बनाने में सहयोग दें। इस समय 30 मिलियन से अधिक प्रवासी भारतीय विदेशों में रह रहे हैं। उनकी मेहनत और उन्नति विदेश तथा भारत में रोल मॉडल की हैसियत रखती है। वे भले ही दूर रह रहे हैं पर अंतरमन से आज भी भारतीय हैं और भारतीयता से जुड़े हैं। वहां काम करते हुए भी वे भारत की अर्थव्यवस्था को बढ़ा रहे हैं। इन सब में वैज्ञानिक, डॉक्टर, शिक्षाविद, अर्थशास्त्री पत्रकार, इंजीनियर और बैंकर्स तथा आईटी प्रोफेशनल्स हैं। इनमें वे भी हैं जो पूर्णतया शिक्षित नहीं हैं फिर भी कमाने जाते हैं। यहां के लाखों छात्र विदेशों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
अच्छा तो यही होगा कि भारत और विदेश में बसे भारतीयों के संबंध मजबूत हों और यह सम्मेलन उन्हें यह प्लेटफार्म देता है। यह भारतीयता की साझी विरासत है। समस्या यह है कि एक तरफ तो प्रवासी भारतीयों को इन सम्मेलनों के दौरान भारत में धन निवेश करने को कहा गया उन्हें सुविधाएं और सहयोग देने की घोषणाएं की गईं  पर प्रवासी भारतीयों ने भारत की मौजूदा राजनीतिक अव्यवस्था और नौकरशाही के घटिया स्तर तथा भ्रष्टाचार को खुले मंच से उजागर कर दिया। वे जानते हैं कि भारत का उद्देश्य प्रवासियों को लुभाने तक ही सीमित है। स्थितियां तो आज भी वही हैं हर तरफ मार-काट और फूंक-ताप मची हुई है। अगर आप एक स्वस्थ वातावरण नहीं दे सकते तो हर बार सम्मेलन में आपका यह आत्मीय भाषण और प्यार बेकार है।  

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