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संजय बिजली परियोजना में उत्पादन फिर ठप, करोड़ों का चूना

संजय बिजली परियोजना में उत्पादन फिर ठप, करोड़ों का चूना

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सुरजीत नेगी/भावानगर। 120 मेगावाट की संजय विद्युत परियोजना में उत्पादन फिर से ठप हो गया है। उत्पादन ठप होने का कारण परियोजना में आई तकनीकी खराबी बताया जा रहा है। जबकि सूत्रों की मानें तो इसमें गड़बड़झाला होने से इन्कार नहीं किया जा सकता व सूत्रों के अनुसार इस तकनीकी खराबी के कारण बोर्ड को करीब 30-40 करोड़ का नुकसान हुआ है व इसमें जैनरेशन लोस भी मिला दिया जाए तो यह आंकड़ा बढ़कर 80 करोड़ तक पहुंच सकता है। गौरतलब है कि लगभग 18 महीनों के बाद जुलाई में उक्त परियोजना में उत्पादन शुरू किया गया था। परियोजना की एक नंबर मशीन को तैयार कर 40 मेगावाट उत्पादन किया जा रहा था। दो नंबर मशीन को भी दिन-रात एक करके उत्पादन के लिए तैयार किया गया व उसके ट्रायल का कार्य भी शुरू कर दिया गया था। परन्तु, रविवार सुबह करीब साढ़े तीन बजे के बाद दोनों मशीनों में तकनीकी खराबी आ गई। पहले ट्रायल में चल रही दो नंबर मशीन ट्रिप कर गई व उसके लगभग बीस मिनट के बाद एक नंबर मशीन भी ट्रिप कर गई। ऐसी स्थिती में मशीन के रनर पर जहां से पानी गिरता है उस नोज़ल का बंद होना जरूरी हो जाता है, जिससे मशीन की गति नियंत्रित होकर धीमी हो जाए व मशीन को कोई नुकसान न पहुंचे। दो नंबर मशीन की नोज़ल तो बंद हो गई, परन्तु एक नंबर मशीन की नोज़ल बंद नहीं हो पाई, जिसके कारण मशीन ओवर स्पीड हो गई।

sanjay-vidyut-project2ओवर स्पीड होने के कारण उसके जैनरेटर को भारी क्षति पहुंची है व आगामी समय में भी उसमें तब तक उत्पादन नहीं हो पाएगा, जब तक की जैनरेटर की मरम्मत नहीं हो जाती। हालांकि दो नंबर मशीन में जल्द ही उत्पादन शुरू होने की उम्मीद की जा रही है। अब सवाल यह उठता है कि क्या प्रबंधन ने समय रहते उत्पादन शुरू करने से पूर्व किए जाने वाली सभी जांच की थी। यदि सभी जांच की गई थी तो केवल दो महीनों में ही खामी कैसे आ गई। यहां यह भी बताते चलें कि मशीन के जैनरेटर रोटर के अनियंत्रित हो जाने पर नोज़ल बंद करके पानी को बंद किया जाता है, फिर गर्वनर द्वारा उसे कंट्रोल किया जा सकता है यदि किसी कारण से गर्वनर भी काम नहीं करता तो एमआईवी से पानी को कंट्रोल किया जा सकता है। परन्तु, यहां पर न तो गर्वनर ने काम किया न ही नोज़ल बंद हुए व एमआईवी से कंट्रोल करने में भी काफी समय लग गया। ऐसा नहीं है कि प्रबंधन द्वारा पहली बार ऐसी चूक की गई है।

sanjay-vidyut-project1इससे पहले भी गत वर्ष जून माह में काजा में स्थित रोंग-टोंग परियोजना में भी प्रबंधन की चूक के कारण तीन युवा इंजीनियरों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। उस हादसे का कारण परियोजना में लगा स्लूस बाल्व का फटना बताया गया था, जबकि उस बाल्व में खराबी की जानकारी उच्चाधिकारियों को समय रहते जनवरी में ही दे दी गई थी परन्तु उच्चाधिकारियों ने उस सूचना को दरकिनार कर वैसे ही रोंग-टोंग परियोजना की टेस्टिंग जारी रखी, जिसका खामियाजा बिजली बोर्ड के दो व मरम्मत में लगी निजी कंपनी के एक अभियन्ता को अपनी जान देकर भुगतना पड़ा। हालांकि प्रबंधन द्वारा उच्चस्तरीय जांच भी करवाई गई, परन्तु आज तक न तो उस जांच का खुलासा किया गया व न ही किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय करते हुए सजा दी गई। दबे स्वर में तो यह भी कहा जा रहा है कि हमेशा कर्मचारियों की कमी का रोना रो रहे बोर्ड में उच्चाधिकारियों को तो सेवा विस्तार दिया जाता है, जबकि छोटे कर्मचारियों की भर्ती नहीं की जा रही है।

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