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फौज में दुश्मनों से भी हार नहीं मानीं, पर प्रशासन की बेरुखी से हारे जर्म सिंह

फौज में दुश्मनों से भी हार नहीं मानीं, पर प्रशासन की बेरुखी से हारे जर्म सिंह

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चुवाड़ी। फौज से रिटायर हुए जर्म सिंह की बूढ़ी आंखें लंबे अरसे से अपने बीमार बेटे के लिए राहत की बाट जोह रही हैं। पिछले 7 साल से कोमा में चल रहे अपने 41 साल के बेटे की बेबसी और सरकार, प्रशासन के साथ अब पंचायत की बेरुखी के आगे जर्म सिंह हार मान रहे हैं, जबकि उन्होंने फौज में रहते हुए दुश्मनों से हार नहीं मानीं। फिलहाल रिटायरमेंट की पेंशन से जिंदी काट रहे जर्म सिंह को इस बात की चिंता है कि उनके मरने के बाद परिवार का क्या होगा।

भट्टियात क्षेत्र के जर्म सिंह का बेटा मदन बद्दी में एक दवा कंपनी में काम करता था। काम करते हुए ही उसके सिर में गंभीर चोट लगी। उसके बाद से मदन कोमा में है। मदन की पत्नी ने दो साल तक दूसरों के घर में झाड़ू-पोंछा कर पति को ठीक करने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहीं। मदन के 2 लड़के और एक लड़की है। आर्थिक तंगी के चलते यह लड़की 8वीं के आगे नहीं पढ़ पाई।

पंचायत से थी आस, वह भी टूट रही है

गांव लूहणी, पंचायत खदेट के 85 वर्षीय बाप जर्म सिंह पहले ही एक बेटे को खो चुके हैं। वे अपनी बहू को नौकरी मिलने पर राहत मिलने की आस रखे हुए हैं। जर्म सिंह की पेंशन से ही सारे खर्च चल रहे हैं। उसे चिंता परिवार कि है कि उसके बाद इन सबका क्या होगा। जर्म सिंह के मुताबिक, उन्होंने पंचायत को लिख कर दिया था, इसीलिए वहीं से उम्मीद थी। अब वो भी टूटती दिखती है। तहसील कल्याण अधिकारी सुरेशना महाजन ने बताया कि प्रभावित परिवार विभागीय औपचारिकताओं को पूरा कर ले, तो विभाग उनकी हरसंभव सहायता करेगा।

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