Covid-19 Update

59,118
मामले (हिमाचल)
57,507
मरीज ठीक हुए
984
मौत
11,228,288
मामले (भारत)
117,215,435
मामले (दुनिया)

आखिर क्या है रूपकुंड का रहस्य ….

आखिर क्या है रूपकुंड का रहस्य ….

- Advertisement -

हमारे देश में बहुत सी जगह ऐसी हैं जो कई रहस्यों से भरी है। इन में से एक है रूपकुंड झील। ज्यूंरागली पहाड़ी के नीचे 150-200 फीट ब्यास (60 से 70 मीटर लम्बी), 500 फीट की परिधि तथा 40 से 50 मीटर गहरी हरे-नीले रंग की अंडाकार आकृति में फैली यह स्वच्छ एवं शांत मनोहारी झील है।

इससे रूपगंगा जलधारा निकलती है। अपनी मनोहारी छटा के अलावा यह झील एस और चीज के लिए चर्चित है और वह है झील के चारों ओर पाये जाने वाले रहस्यमय प्राचीन नरकंकाल, अस्थियां, विभिन्न उपकरण, कपड़े, गहने, बर्तन, चप्पल एवं घोड़ों के अस्थि-पंजर आदि वस्तुएं। यह झील बागेश्वर से सटे चमोली जनपद में बेदनी बुग्याल के निकट स्थित है। हर बारहवें वर्ष नौटी गांव के हजारों श्रद्धालु तीर्थ यात्री राजजय यात्रा लेकर निकलते हैं। नंदादेवी की प्रतिमा को चांदी की पालकी में बिठाकर रूपकुंड झील से आचमन करके वे देवी के पावन मंदिर में दर्शन करते हैं।

इस यात्रा से संबंधित कथा के अनुसार अपने स्वामी गृह कैलाश जाते समय अनुपम सुंदरी हिमालय (हिमवन्त) पुत्री नंदादेवी जब शिव के साथ रोती-बिलखती जा रही थी तो मार्ग में एक स्थान पर उन्हें प्यास लगी। नंदा-पार्वती के सूखे होंठ देख शिवजी ने चारों ओर देखा परन्तु कहीं पानी नहीं दिखाई दिया, उन्होंने अपना त्रिशूल धरती पर मारा, धरती से पानी फूट पड़ा। नंदा ने प्यास बुझाई, लेकिन पानी में उन्हें एक रूपवती स्त्री दिखाई दी, जो शिव के साथ बैठी थी। नंदा को चौंकते देख शिवजी समझ गये, उन्होंने नंदा से कहा यह रूप तुम्हारा ही है।

प्रतिबिम्ब में शिव-पार्वती एकाकार दिखाई दिए। तब से ही वह कुंड रूपकुंड और शिव अर्द्धनारीश्वर कहलाए। यहां का पर्वत त्रिशूल और नंद-घुंघटी कहलाया, उससे निकलने वाली जलधारा नन्दाकिनी कही गई। रूपकुंड झील वर्षों तक दुर्गम होने के कारण अज्ञात ही रहा।

रूपकुंड के आसपास पड़े अस्थियों के ढेर एवं नरकंकालों की खोज सर्वप्रथम वर्ष 1942 – 43 में भारतीय वन निगम के एक अधिकारी द्वारा की गई। वन विभाग के अधिकारी मढ़वाल यहां दुर्लभ पुष्पों की खोज करने गए थे। एक रेंजर अनजाने में झील के भीतर किसी चीज़ से टकराया। देखा तो कंकाल पाया। खोज की तो झील के आसपास और तलहटी में नरकंकालों का ढेर मिला। अधिकारी के साथियों को ऐसा लगा, जैसे वे किसी दूसरे ही लोक में आ गए हों। उनके साथ चल रहे मज़दूर तो इस दृश्य को देखते ही भाग खड़े हुए।

भारत सरकार के भूगर्भ वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों के एक दल ने भी दुर्गम क्षेत्र में प्रवेश कर परीक्षण किया था। सिद्ध हुआ कि यह घटना तीन-चार सौ से 600 साल पुरानी है और ये अस्थि अवशेष किसी तीर्थ यात्री दल के हैं। कंकाल लगभग 600 वर्ष पुराने हैं। यहां के अवशेषों में तिब्बती लोगों के ऊनी कपड़े के बने बूट, लकड़ी के बर्तनों के टुकड़े, घोड़े की साबुत नालों पर सूखा चमड़ा और चटाइयों के टुकड़े हैं। याक के अवशेष भी मिले हैं।

स्वामी प्रणवानन्द ने अपने अध्ययन के निष्कर्ष में रूपकुंड में प्राप्त अस्थियां आदि वस्तुऐं कन्नौज के राजा यशोधवल के यात्रा दल के माने हैं जिसमें राजपरिवार के सदस्यों के अलावा अनेक दास-दासियां, कर्मचारी तथा कारोबारी आदि सम्मिलित थे। बताया गया है कि हताहतों की संख्या कम से कम तीन सौ होगी। वैज्ञानिकों का दावा है कि इन लोगों ने मोक्ष पाने के लिए आत्महत्या नहीं की। हड्डियों के परीक्षण में खोपडि़यों पर क्रिकेट की गेंद जैसी भारी गोल वस्तु के प्रहार के निशानों की पुष्टि हुई है जो कि भारी वजन वाले ओले हो सकते हैं।

शोध के अनुसार ये सभी लोग एक साथ सिर की चोट से मरे हैं। इस दिव्य कुंड की अथाह गहराई, कटोरेनुमा आकार तथा चारों ओर बिखरे नर कंकाल व वातावरण में फैले गहन निस्तब्धता से मन में कौतूहल व जिज्ञासा का ज्वार उत्पन्न हो जाता है। रूपकुंड के रहस्य का प्रमुख कारण ये नर कंकाल ही हैं, जो न केवल इसके इर्द–गिर्द दिखते हैं बल्कि तालाब में इनकी परछाइयां भी दिखाई पड़ती हैं।

दुनिया के अजूबों में शामिल चिचेन इत्ज़ा

- Advertisement -

Facebook Join us on Facebook Twitter Join us on Twitter Instagram Join us on Instagram Youtube Join us on Youtube

हिमाचल अभी अभी बुलेटिन

Download Himachal Abhi Abhi App Himachal Abhi Abhi IOS App Himachal Abhi Abhi Android App

टेक्नोलॉजी / गैजेट्स / ऑटो

Himachal Abhi Abhi E-Paper


विशेष




सब्सक्राइब करें Himachal Abhi Abhi अलर्ट
Logo - Himachal Abhi Abhi

पाएं दिनभर की बड़ी ख़बरें अपने डेस्कटॉप पर

अभी नहीं ठीक है