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गांधी जी ने सर्वोदय को जिया है

गांधी जी ने सर्वोदय को जिया है

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सर्वोदय महात्मा गांधी के द्वारा प्रतिपादित एक ऐसा विचार है जिसमें सबके हित की भावना है। गांधी जी ने स्पष्ट कहा था, मैं अपने पीछे कोई पंथ या संप्रदाय नहीं छोड़ना चाहता । इसी लिए सर्वोदय आज एक समर्थ जीवन,समग्र जीवन और संपूर्ण जीवन का पर्याय बन चुका है। सर्वोदय के दो अर्थ हैं एक तो सबका उदय और दूसरा सब प्रकार से उदय। स्वतंत्रता से पूर्व स्वराज्य शब्द का जो महत्व था वही महत्व सर्वोदय शब्द का आज है। गौरतलब है कि गांधी जी ने 1936 में ही घोषणा कर दी थी कि गांधीवाद नाम की कोई चीज नहीं है। गांधी जी मूलतः एक प्रयोगकर्ता थे। सत्य एवं अहिंसा ही उनके जीवनका मूल लक्ष्य था। उन्होंने किसी नए तथ्य या सिद्धांत का आविष्कार नहीं किया। इसलिए गांधी विचार और उसपर आधारिक सर्वोदय विचार जीवन का पूरा-पूरा चित्र है.. वाद नहीं है।


  • भले ही गांधी जी ने अपने को किसी वाद से नहीं जोड़ा, लेकिन गांधी विचारदर्शन को गांधीवाद कहना ही उचित होगा। 
  • भले ही मानव समाज  के उत्थान के लिए कितनी ही कोशिशें की गईं  हों,पर सारी ही प्रवृत्तियां कुएं के मेंढक की तरह रह गईं। जो भी नियम बनाए गए उनका वैचारिक अधिष्ठान लुप्तप्राय हो चुका है।

वस्तुतः गांधी ने सर्वोदय को जिया है। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त शोषण, उत्पीड़न, आर्थिक, सामाजिक विषमता पर प्रहार के साथ संयम और त्याग द्वारा संपूर्ण भारत को आलोकित किया। सर्वोदय कोई संप्रदाय नहीं,यह तो मानव एकता, सेवा तथा समरसता की भावना से परिपूर्ण समग्र दृष्टि है। जो पूरी तौर पर भारतीय चिंतन का पर्याय है। अन्याय का प्रतिकार ही गांधी जी के जीवन का लक्ष्य था। उन्होंने सबके अंदर परमात्मा का स्वरूप देखा वे भारतीय संस्कृति के माध्यम से पूरे विश्व को बदलने के लिए सत्य और अहिंसा को मुख्य अस्त्र-शस्त्र मानते थे। आज जो अमीर-गरीब की खाई बनी हुई है ,जिसमें मुट्ठी भर लोग सुख भोग रहे हैं  और बाकी जनता मजबूरी की जिंदगी जी रही है उसे गांधी के सर्वोदय दर्शन से ही सुलझाया जा सकता है। अगर ध्यान दें तो गांधी के लिए अर्थशास्त्र और नैतिकता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

सर्वोदय विशुद्ध रूप से आर्थिक सिद्धांत है जिसका लक्ष्य हर तरह के विकास को समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचाना है। जबतक मात्र कुछ ही लोगों की सीमित समृद्धि साधन विहीनों तक नहीं पहुंचती तब तक किसी भी दौर में विकास के लक्ष्य को नहीं प्राप्त किया जा सकता।

साथ ही मनुष्य में नैतिकता भी होनी आवश्यक है । जरूरतें बढ़ाकर ऐसा भ्रष्ट समाज पैदा हो गया है जो अपने अस्तित्व को बरकरार रखने के लिएअपने आपको ही कुतरने लगा है। यह स्थिति समाप्त होनी चाहिए तभी महात्मा गांधी का सर्वोदय विचार सार्थक होगा।

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