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इसे कहते हैं गिलहरी का कमाल

इसे कहते हैं गिलहरी का कमाल

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गिलहरियां हमारे आसपास की सबसे परिचित मासूम प्राणी हैं। ये किसी का नुकसान नहीं करतीं और हमेशा मेहनत से अपने खाने-पीने का बंदोबस्त करती हैं। मूंगफली, अखरोट और अन्य प्रकार के बीज इनके पसंदीदा भोजन हैं। हां, ये अपने भोजन का संग्रहण भी करती हैं, पर कभी कभी इनकी संग्रह करने की आदत इतिहास को सुरक्षित करने का काम करती है जैसा कि इस मामले में हुआ। इस बात पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल ही होगा, पर 30 हजार साल पहले के पौधे रूस में फिर से जीवंत किए गए। एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि रूसी वैज्ञानिकों ने साइबेरिया में मिले बीजों से पौधे उगाए हैं। रूस की एकेडमी ऑफ साइंसेस की शोधकर्ता स्वेतलाना याशिना और डेविड गिलिचिंस्की का कहना है कि हेर्बाकस सिलेन स्टेनोफिला के बीज अब तक के सबसे पुराने पौधे के बीज हैं, जिन्हें फिर से जीवन मिला है। ये बीज कभी गिलहरियों ने जमा किए थे। इससे पहले इजराइल में मसादा किले में 2000 साल पुराने खजूर के बीज को उगाया गया था।

शोधकर्ताओं का का कहना है कि रेडियो कार्बन कालावधि से इस बात पुष्टि हुई है कि टिश्यू 31,800 साल पुराने हैं। उनका मानना है कि रूस के उत्तर पूर्वी साइबेरिया में कोलिमा नदी के किनारे पर गिलहरी के 70 बिलों के पता चलने की बात कही गई है, जिसमें विभिन्न पौधों के लाखों बीज हैं। ‘सभी बिल वर्तमान सतह से 20 से 40 मीटर की गहराई में मिले हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि पर्माफ्रॉस्ट ने बड़े फ्रीजर का काम किया और गिलहरियों द्वारा जमा बीज और फल बिना किसी बाधा के बंद दुनिया में औसत माइनस 7 डिग्री सेल्सियस तापमान पर कई हजार साल तक सुरक्षित रहे। पुराने मैटेरियल से वैज्ञानिक नए नमूने इसलिए उगा पाए कि बिल बर्फ से ढके थे और उसके बाद नियमित रूप से जमे रहते थे और पिघलते नहीं थे। इसकी वजह से पर्माफ्रॉस्ट डिग्रेडेशन नहीं हुआ। तो इस तरह गिलहरी के भोजन संग्रहण का लाभ एक प्राचीन वानस्पतिक इतिहास को जीवंत करने में हुआ।

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