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संतानसुख चाहते हैं तो शनिवार को जरूर करें ये व्रत

संतानसुख चाहते हैं तो शनिवार को जरूर करें ये व्रत

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एकादशी में जहां भगवान विष्णु की पूजा की जाती है वहीं त्रयोदशी को प्रदोष व्रत कर भगवान शिवशंकर की आराधना की जाती है। मान्यता है कि प्रदोष व्रत करने से सभी प्रकार के दोषों का निवारण हो सकता है। प्रदोष व्रत प्रत्येक मास की त्रयोदशी को रखा जाता है लेकिन हर त्रयोदशी की पूजा वार के अनुसार की जाती है। प्रत्येक वार की व्रत कथा भी भिन्न है। इस बार 06 अक्टूबर को शनि प्रदोष व्रत पड़ रहा है। तो आइये जानते हैं शनिवार के दिन रखे जाने वाले प्रदोष व्रत यानि शनि त्रयोदशी के महत्व, व्रत कथा व पूजा विधि के बारे में।

व्रत का महत्व

शास्त्रों में शनि के प्रकोप से बचने के लिये शनि प्रदोष व्रत बताया गया है। सही विधि-विधान से किये गए शनि प्रदोष का हितकारी फल मिलता है। इस व्रत को करने से न सिर्फ शनिदेव के कारण होने वाली परेशानियां दूर होती हैं, बल्कि उनका आशीर्वाद भी मिलता है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की शनि प्रदोष के दिन जो व्यक्ति शनि से संबंधित वस्तुओं जैसे लोहा, तेल, तिल, काली उड़द, कोयला और कम्बल आदि का दान करता है तथा व्रत रखता है, शनिदेव उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं।


इस बार प्रदोष व्रत शनिवार को पडने के कारण शिव और माता पार्वती के साथ ही शनिदेव की भी कृपा प्राप्त होगी। इस व्रत में दो समय भगवान शिव की पूजा की जाती है, एक बार सुबह और एक बार शाम को सूर्यास्त के बाद, यानी कि रात्रि के प्रथम पहर में। शाम की इस पूजा का बहुत महत्व है क्योंकि सूर्यास्त के पश्चात रात्रि के आने से पूर्व का समय प्रदोष काल कहलाता है।

शास्त्रों में वर्णित है कि संतान की कामना रखने वाले दंपति को शनि प्रदोष व्रत अवश्य रखना चाहिए। संतान-प्राप्ति के लिए शनि प्रदोष वाले दिन सुबह स्नान करने के पश्चात पति-पत्नी को मिलकर शिव-पार्वती और पार्वती-नन्दन गणेश की पूजा-अर्चना करनी चाहिए और शिवलिंग पर जलाभिषेक करना चाहिए। इसके उपरान्त शनिदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए किसी पीपल के वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाना चाहिए।

साथ ही उन्हें पूरे दिन बिना अन्न-जल ग्रहण किए उपवास करना चाहिए। ऐसा करने से जल्दी ही संतान की प्राप्ति होती है। संध्या-काल में भगवान का भजन-पूजन करना चाहिए और शिवलिंग का जल और बिल्व की पत्तियों से अभिषेक करना चाहिए। साथ ही इस दिन महामृत्युंजय-मंत्र के जाप का भी विधान है। इस दिन प्रदोष व्रत कथा का पाठ करना चाहिए और पूजा के बाद भभूत को मस्तक पर लगाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार जो साधक इस तरह शनि प्रदोष व्रत का पालन करता है, उसके सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं और सम्पूर्ण इच्छाएँ पूरी होती हैं।

कैसे करें व्रत

शनि प्रदोष व्रत के दिन व्रती को प्रात:काल उठकर नित्य क्रम से निवृत हो स्नान कर शिव जी का पूजन करना चाहिये। पूरे दिन मन ही मन “ऊँ नम: शिवाय ” का जप करें। पूरे दिन निराहार रहें। त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सूर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व, शिव जी का पूजन करना चाहिये। शनि प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे के बीच की जाती है।

शाम को दोबारा स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर लें । पूजा स्थल अथवा पूजा गृह को शुद्ध कर लें। यदि व्रती चाहे तो शिव मंदिर में भी जा कर पूजा कर सकते हैं। पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। पूजन की सभी सामग्री एकत्रित कर लें। कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भर लें। कुश के आसन पर बैठ कर शिव जी की पूजा विधि-विधान से करें। “ऊं नम: शिवाय ” कहते हुए शिव जी को जल अर्पित करें। इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर शिव जी का ध्यान करें

ध्यान का स्वरूप

करोड़ों चंद्रमा के समान कांतिवान, त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्रमा का आभूषण धारण करने वाले पिंगलवर्ण के जटाजूटधारी, नीले कण्ठ तथा अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, वरदहस्त, त्रिशूलधारी, नागों के कुण्डल पहने, व्याघ्र चर्म धारण किये हुए, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान शिव जी हमारे सारे कष्टों को दूर कर सुख समृद्धि प्रदान करें।

ध्यान के बाद, शनि प्रदोष व्रत की कथा सुने अथवा सुनायें। कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर 11या 21 या 108 बार “ऊँ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा ” मंत्र से आहुति दें । उसके बाद शिव जी की आरती करें। उपस्थित जनों को आरती दें।
सभी को प्रसाद वितरित करें । उसके बाद भोजन करें । भोजन में केवल मीठी सामग्रियों का उपयोग करें

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