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शिंदे@ Himachal: प्रदेश Congress में चल रही वर्चस्व की जंग को रोकना सबसे बड़ी चुनौती

शिंदे@ Himachal: प्रदेश Congress में चल रही वर्चस्व की जंग को रोकना सबसे बड़ी चुनौती

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सीएम और सुक्खू  के बीच जारी शीत युद्ध को रोकना सबसे अहम मुद्दा

शिमला। विधानसभा चुनावों से पहले प्रदेश कांग्रेस में चल रही वर्चस्व की जंग को रोकना प्रदेश कांग्रेस के नए प्रभारी सुशील कुमार शिंदे के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। उन्हें न केवल सीएम वीरभद्र सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू के बीच जारी शीत युद्ध को रोकना है, बल्कि राज्यभर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं में एकता का संदेश देना है। लेकिन अभी जिस तरह के हालात चल रहे हैं, उससे लगता है कि दोनों गुट एक दूसरे को बख्शने के मूड में नहीं हैं। प्रदेश कांग्रेस में चल रही खींचतान नई है

पिछले काफी समय से संगठन और सरकार में टकराव रहा है। इनका मामला दिल्ली दरबार तक भी पहुंचा है, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला है। जिस तरह से इनका मामला चल रहा है, उससे लगता है कि हाईकमान ने भी हिमाचल में संगठन के हालात को गंभीरता से नहीं लिया है। यही कारण है कि प्रदेश कांग्रेस की पहले प्रभारी रही अंबिका सोनी ने इस दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं की और नतीजा यह है कि वह संगठन के प्रभारी पद से मुक्त होकर साइड हो गई हैं और संगठन और सरकार में तालमेल की कमी और जारी जंग ज्यों की त्यों है।

नए कांग्रेस प्रभारी का सबसे बड़ा चैलेंज सरकार और संगठन में तालमेल बिठाना 

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार शिंदे को हिमाचल कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया है। उनके समक्ष भी सबसे बड़ा चैलेंज सरकार और संगठन में तालमेल को बिठाना है। उन्होंने दिल्ली में सीएम वीरभद्र सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू से मुलाकात कर संगठन का फीड बैक लिया है। अब वे तीन अगस्त को प्रदेश के दौरे पर आ रहे हैं और उस दिन उन्होंने शिमला में पार्टी पदाधिकारियों और विधायकों के साथ बैठक रखी है। ऐसे में नजरें अब इन बैठकों पर टिकी है। राजनीतिक पर्यवक्षकों की मानें तो शिंदे को संगठन और सरकार में तालमेल बिठाने के कड़े कदम उठाने होंगे और तालमेल बिठाने के लिए इनके नेताओ की सार्वजनिक बयानबाजी पर लगाम लगानी होगी।

शह और मात के खेल में मशगूल सीएम और सुक्खू

इस समय दोनों तरफ से एक दूसरे के खिलाफ आक्रोश देखने को मिल रहा है। हालात तो यह है कि एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए ये नेता कोई कसर नहीं छोड़ रहे और पर्दे के पीछे चल रही लड़ाई अब सामने आई है। दोनों नेता शह और मात के खेल में मशगूल हैं।  उधर, कार्यकर्ता इनके इस खेल से नाराज हैं। वे तो यहां तक कहते हैं कि इन्हें तो अपनी राजनीति करनी है और इसके लिए दोनों नेताओं ने संगठन को ही ताक पर रख दिया है। ऐसे में संगठन का कोई भला होने वाला नहीं है। बहरहाल, अब सुशील कुमार शिंदे की परीक्षा शुरू हो गई है। प्रदेश कांग्रेस के नए प्रभारी बने शिंदे के समक्ष पहला कार्य ही यही है कि वह इन दोनों को एक साथ बिठाने के साथ-साथ मिलकर कार्य करने को जोड़ सके। अब नजरें शिंदे के अगले कदम पर टिकी है कि वह क्या रुख अपनाते हैं और उसका आगे क्या असर होता है और चुनाव से पहले वे कैसे संगठन को चार्ज कर चुनाव के लिए फील्ड में सक्रिय करते हैं।

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