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इस शुभ मुहूर्त में बांधे भाई की कलाई पर राखी

इस शुभ मुहूर्त में बांधे भाई की कलाई पर राखी

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भाई की कलाई पर राखी बांधने के लिये हर बहन रक्षा बंधन के दिन का इंतजार करती है। श्रावण मास की पूर्णिमा को यह पर्व मनाया जाता है। भाई-बहन के प्यार, स्नेह को दर्शाते इस त्योहार की परंपरा लगभग हर धर्म में मनाई जाती है। धर्म-मज़हब से परे यह त्योहार भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है। किसी भी रिश्ते की मजबूती की बुनियाद होता है विश्वास और यही विश्वास एक बहन अपने भाई पर रखती है जब वह इस पर्व के दिन भाई की कलाई पर एक धागा जिसे राखी कहते है, बांधती है।

अपने हाथ में राखी बंधवाकर भाई यह प्रतिज्ञा करता है कि वह अपनी बहन की सदैव रक्षा करेगा चाहे परिस्थिति कितनी ही विषम क्यों ना हो। राखी का धागा केवल रक्षा ही नहीं बल्कि प्रेम और निष्ठा से दिलों को भी जोड़ता है। ज्योतिषाचार्य पं दयानन्द शास्त्री के अनुसार रक्षा बंधन सावन की पूर्णिमा को मनाया जाता है। राखी सामान्यतः भाई बहनों का त्योहार है पर इसको ब्राह्मणों, गुरु और परिवार में छोटी लड़कियों द्वारा सम्मानित संबंधियों (जैसे पुत्री द्वारा पिता) को भी बांधी जाती है। सार्वजनिक रूप से किसी नेता या प्रतिष्ठित व्यक्ति को भी राखी बांधी जाती है।


रक्षाबंधन के दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं। यह प्रथा प्राचीन समय से चली आ रही है। कहा जाता है भाई की कलाई पर राखी बांधते समय बहनें उनकी लंबी आयु की कामना करती हैं। जबकि भाई उन्हें जीवनभर उनकी रक्षा करने का वचन देता है। राखी वाले दिन बहनें सुबह जल्दी जागकर नहा धोकर भगवान की पूजा करके भाई को तिलक लगाकर राखी बांधती है और उन्हें मिठाई खिलाती है। भाई भी उन्हें उपहार देते हैं। भाई को राखी बांधने तक बहनें कुछ भी खाती-पीती नहीं हैं। भाइयों की शादी के बाद बहने अपने भाई की पत्नी को भी राखी बांधती है ताकि उन दोनों का रिश्ता हमेशा सही सलामत रहे।

यह रहेगा राखी बांधने का शुभ मुहूर्त—

रक्षाबंधन 2018 राखी बांधने का मुहूर्त = 05:59 से 17:25 तक

मुहूर्त की अवधि = 11 घंटे 26 मिनट।

रक्षाबंधन में अपराह्न मुहूर्त = 13:39 से 16:12 तक।

मुहूर्त की अवधि = 02 घंटे 33 मिनट।

रक्षाबंधन के दिन भद्रा सूर्योदय से पूर्व ही समाप्त हो जाएगी।

राखी बांधते समय एक खास मंत्र का उच्चारण किया जाता है जो निम्नलिखित है :

मंत्र : ‘येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वां प्रतिबध्नामि, रक्षे! मा चल! मा चल!!’

इसका अर्थ है – जिस प्रकार राजा बलि में रक्षा सूत्र से बंधकर विचलित हुए बिना अपना सब कुछ दान कर दिया, उसी प्रकार हे रक्षा! आज मैं तुम्हें बांधता हूं, तू भी अपने उद्देश्य से विचलित न होना और दृढ़ बना रहना ॥

ज्योतिषाचार्य पं दयानन्द शास्त्री, उज्जैन मध्यप्रदेश

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