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कालापानी की सजा से कम नहीं इन गांवों में जिदंगी, हंसती खेलती बस्तियां बन चुकी हैं खंडहर

कालापानी की सजा से कम नहीं इन गांवों में जिदंगी, हंसती खेलती बस्तियां बन चुकी हैं खंडहर

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हरिपुर। कोई अपनी जन्मभूमि छोड़ना नहीं चाहता है। मजबूरी या फिर जरूरत जन्मभूमि छोड़ने को मजबूर करती है। पर जिस मिट्टी में खेलकर बड़े हुए उसे छोड़ना किसी के लिए भी आसान बात नहीं हैं। कोई दिल पर पत्थर रखकर ही ऐसा करता है। ऐसा ही मामला देहरा उपमंडल के तहत पड़ते धार, चतरा, हाली बस्ती व लूणसू आदि गांवों में देखने को मिल रहा है। यहां पर मूलभूत सुविधाओं की कमी के चलते लोग गांवों से पलायन कर रहे हैं और दूसरी जगह जाकर बस रहे हैं।

आलम यह है कि कभी हंसती खेलती जाट बस्ती आज खंडहर बन चुकी है। यही कारण है कि लोग अपने इलाके को कालापानी के नाम से पुकारते हैं। गांवों में मूलभूत सुविधाओं की कमी की बात करें तो न तो सड़क है और न कोई स्वास्थ्य सुविधा। यहां पर एक माचिस और दूध के लिए लोगों को आठ किलोमीटर का सफर करना पड़ता है। यही नहीं उचित मूल्य की दुकान के राशन के लिए 14 किलोमीटर की दौड़ लगानी पड़ती है। अगर कोई बीमार पर पड़ जाए तो मुश्किल और भी बढ़ जाती है। एंबुलेंस के जमाने में आज भी मरीज को पालकी से 12 किलोमीटर दूर पहुंचाना पड़ता है। समय पर स्वास्थ्य सुविधा न मिलने के चलते कई लोग दम तोड़ चुके हैं। इन्ही कारणों से गांवों के 40 से 50 घर ख़ाली हो चुके हैं और कुछ लोग एक दूसरे के घरों पर आकर रह रहे हैं।

बीमार को अस्पताल पहुंचाने के लिए अभी भी पालकी सहारा

धार गांव में छोटी सी दुकान करने वाले बुजुर्ग रोशन लाल का कहना है कि जब  यहां कोई बीमार हो जाए तो उसे चारपाई या पालकी  में उठाकर 12 किलोमीटर दूर लेकर पीएचसी मसरूर या हरिपुर  लेकर जाना पड़ता है और बेहतर इलाज के लिए  नगरोटा सूरियां या कांगड़ा टीएमसी जाना पड़ता है। मदन लाल ने बताया कि समय पर स्वास्थ्य सुविधा न मिलने से पिछले एक दशक से डेढ़ दर्जन लोग अपनी जान गवां चुके हैं, उनके भाई कमल सिंह की मौत भी समय से पहले सिर्फ इसलिए हुई की समय पर एंबुलेंस नहीं मिली। पूर्व सैनिक मेजर मोहिंदर सिंह का कहना है कि यहां जाट समुदाय के 15 -16 परिवार रहते थे। शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क की सुविधा न होने से सभी लोग कांगड़ा, गगल, चंडीगढ़ में बस गए, जिससे जाट बस्ती के घर अब खंडर बन चुके हैं।

इन गांवों में कोई नहीं करना चाहता लड़की की शादी

70 वर्षीय सीताराम का कहना है कि  उनके धार गांव के युवकों के साथ आसपास के गांव वाले भी अपनी बेटियों की शादी भी यहां नहीं करवाना चाहते और अगर कोई बेटी की शादी कर भी दे तो वह बाद में ताने मारते हैं कि हमें पहले पता होता तो कभी अपनी बेटी की शादी यहां नहीं करते। स्थानीय निवासी  मदन लाल और रोशन लाल का कहना है कि युवा पीढ़ी अपना बेहतर भविष्य बनाने के लिए गांव छोड़कर विकसित इलाकों में जा रहे हैं। फिर अच्छी नौकरी मिलने के बाद वहीं सेटल हो जा रहे हैं  और गांव में रह जाते हैं बुजुर्ग लोग।  बच्चे तो उन्हें अपने साथ ले जाना चाहते हैं पर बुजुर्ग अपनी जन्मभूमि नहीं छोड़ना चाहते। नीति चौधरी ने बताया कि वह ठाकुर कॉलेज से बीएड कर रही हैं और सड़क न होने के कारण हमें रोजाना बस लेने के लिए अपने गांव से 12 किलोमीटर दूर जंगल के रास्ते  गुलेर जाना पड़ता है। गांव के उपप्रधान नितिन ठाकुर ने बताया कि सड़क न होने के कारण  हमें अखबार भी रेलवे से आता है और वह भी कभी शाम को मिलता है तो कभी अगले दिन।

रेलवे ही है एकमात्र आने-जाने का विकल्प

प्रधान किशोरी लाल ने बताया कि उनके गांव को आने जाने का रास्ता मात्र रेलवे ही है और आजकल तो 2 ओर 3 ट्रेनें ही जा रही हैं। बारिश होने पर यह भी बंद हो जाती हैं और कोई बीमार हो जाए तो उन्हें पालकी में ले जाकर पीएचसी मसरूर ले जाया जाता है, जिससे कई लोगों की समय से इलाज की सुविधा न मिलने से मौत हो चुकी है और सड़क न होने से जो लड़के-लड़कियां पढ़ने के लिए जंगल के रास्ते से होकर हरिपुर कॉलेज जाती हैं  और सर्दियों के समय शाम जल्दी होने से लड़कियों के साथ जंगल में कुछ गलत न हो जाए इसका डर लगा रहता है।

शांति देवी ने बताया कि उन्हें घर में आग जलाने के लिए माचिस लेने के लिए भी 8 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। उन्होंने सीएम जयराम ठाकुर से प्रार्थना की कि वह एक दिन के लिए उनके गांव में आकर रहे। जब देहरा के  विधायक होशियार सिंह ने बताया कि इन  चार पांच गांवों के लोगों को बहुत समस्या का सामना करना पड़ रहा है और में शीघ्र ही  इनकी समस्याओं को विधानसभा में लेकर जाउंगा और उचित करवाई करूंगा और इसका हल निकालूंगा।

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