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परिवार से कहीं आपकी दूरी तो नहीं बढ़ा रहा सोशल मीडिया

परिवार से कहीं आपकी दूरी तो नहीं बढ़ा रहा सोशल मीडिया

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नई तकनीक के आने से बहुत कुछ बदला है, इस मामले में कि एक तरह से हमारा पूरा जीवन ही जैसे डिजिटल हो चुका है। इसकी वजह से हम शुष्क और संवेदनाहीन जीवन जीने लगे हैं तथा अपने परिवार,स्नेही जनों से भावनात्मक तौर पर दूर होते जा रहे हैं। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई कि डिनर के वक्त एक मामूली कॉल भी आपके डिनर के आनंद को कम कर सकती है। ऐसे में आप भोजन पर ध्यान नहीं दे पाते और उसके आनंद से वंचित रह जाते हैं। जिन लोगों को भोजन करते वक्त फोन करने या रिसीव करने की आदत होती है वे कभी भोजन की सहभागिता का आनंद नहीं ले पाते।

एकाग्रता को भंग करता है सोशल मीडिया

सोशल मीडिया की तकनीक भले ही अद्भुत हो पर वह हमारी एकाग्रता को भंग करती है और बड़ी आसानी से हमें हाशिए पर धकेल देती है। इसकी वजह से हम अपने अच्छे दोस्तों और परिवार के सहचर्य से वंचित रह जाते हैं। इस विषय को लेकर दो फील्ड एक्सपैरीमेंट्स किए गए। एक रेस्टोरेंट में प्रतिभागियों से कहा गया कि या तो आप अपने फोन को वाइब्रेट कर सामने रख सकते हैं या फिर साइलेंट कर वहां रखे कंटेनर में डाल सकते हैं।
खाना खत्म होने के बाद कुछ प्रतिभागियों को ऐसे फार्म दिए गए, जिनमें लिखे प्रश्नों के उत्तर उन्हें देने थे। इसमें पूछा गया था कि इस दौरान वे सोशल विहेवियर में कितने जुड़े, वे आनंदित थे, बोर हो रहे थे या फिर अपने को अलग थलग सा महसूस कर रहे थे। यह भी देखा गया कि इस दौरान उन्होंने कितनी बार फोन का इस्तेमाल किया। उनसे यह भी पूछा गया कि सर्वे के पूरा होने के पंद्रह मिनट पहले वे कैसा महसूस कर रहे थे यह कार्यक्रम एक हफ्ते तक दिन में पांच बार चला। पाया गया कि बातचीत के दौरान उन्होंने स्मार्ट फोन का इस्तेमाल किया। जिन्होंने नहीं इस्तेमाल किया वे बातचीत के दौरान अधिक विचलित रहे। कुछ छात्रों ने कहा कि जब वे फोन पर थे तो उन्हें बातचीत में कम मजा आया।

आत्मकेंद्रित और नार्सिस कंडीशन के शिकार हो जाते हैं

इस सर्वे का एक रोचक पक्ष भी सामने आया कि यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स जिन्हें डिजिटल ही कहा जाता है वे अपने फोन पर रहते हुए मल्टी टास्किंग को अंजाम दे सकते थे पर इसकी वजह से वे दूसरों से नहीं जुड़ पाते। यहां तक कि सामान्य फोन का भी इस्तेमाल करते हुए लोग दूसरों से नहीं जुड़ पाते। एक दूसरे अध्ययन में पाया गया कि जो सोशल मीडिया पर कम समय व्यतीत करते हैं वे अपनी संवेदन शीलता बचाए रखते हैं। पर जो लगातार इस पर रहते हैं वे आत्मकेंद्रित और नार्सिस कंडीशन (आत्मुग्धता) के शिकार हो जाते हैं। एक बात और भी कि जो लोग कम संवेदनशील थे और अपनी भावनाओं को प्रकट कर पाने में  असफल थे उन्होंने सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल किया। जो सोशल मीडिया के आदी हो चुके थे और दूसरों की भावनाओं से उत्तेजित होते थे उन्होंने फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसी सोशल साइट्स का ज्यादा समय व्यतीत किया। एक अन्य रिसर्च के अनुसार किशोर होते बच्चे पांच दिन में ही मैसेज करना सीख गए जबकि कॉलेज आयु के लोगों ने वीडियो चैट और ऑडियो चैट के साथ व्यक्तिगत बातचीत के साथ बेहतर संबंध बनाए।

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