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घर में रखेंगे श्रीयंत्र तो बरसेगा यश-कीर्ति-ऐश्वर्य

घर में रखेंगे श्रीयंत्र तो बरसेगा यश-कीर्ति-ऐश्वर्य

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श्रीयंत्र को यंत्रराज, यंत्र शिरोमणि, षोडशी यंत्र व देवद्वार भी कहा गया है। ऋषि दत्तात्रेय व दुर्वासा ने श्रीयंत्र को मोक्षदाता माना है। जैन शास्त्रों ने भी इस यंत्र की प्रशंसा की है। जिस प्रकार अगरबत्ती किसी व्यक्ति विशेष से संबंधित नहीं होती, वह जहां पर भी जलाई जाती है, वहीं पर सुगंध बिखेरने लग जाती है, इसी प्रकार मंत्र सिद्ध चैतन्य श्रीयंत्र जहां पर भी स्थापित होता है वहीं पर यह अनुकूल फल देने में समर्थ हो जाता है। जिस तरह शरीर व आत्मा एक दूसरे के पूरक हैं उसी तरह देवता व उनके यंत्र भी एक दूसरे के पूरक हैं।
यंत्र को देवता का शरीर और मंत्र को आत्मा कहते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि श्रीयंत्र की अद्भुत शक्ति के कारण इसके दर्शन मात्र से ही लाभ मिलना प्रारम्भ हो जाता है। श्रीयंत्र की कृपा से मनुष्य को धन, समृद्धि, यश, कीर्ति, ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति होती है। श्री यंत्र के पूजन से रुके हुए कार्य बनते हैं। श्री यंत्र की श्रद्धापूर्वक नियमित रूप से पूजा करने से दुःख दरिद्रता का नाश होता है। श्री यंत्र की साधना -उपासना से साधक की शारीरिक और मानसिक शक्ति पुष्ट होती है। इस यंत्र की पूजा से दस महाविद्याओं की कृपा भी प्राप्त होती है। श्री यंत्र की साधना से आर्थिक उन्नति होती है और व्यापार में सफलता मिलती है।
एक सुन्दर आख्यान आता है कि एक बार लक्ष्मी अप्रसन्न होकर वैकुंठ को चली गईं, इससे पृथ्वी तल पर काफी समस्याएं पैदा हो गईं। ब्राह्मण और वणिक वर्ग बिना लक्ष्मी के दीन-हीन, असहाय से घूमने लगे, तब ब्राह्मणों में श्रेष्ठ, वशिष्ठ ने निश्चय किया कि मैं लक्ष्मी को प्रसन्न कर भूतल पर ले आऊंगा। जब वशिष्ठ वैकुंठ में जा कर लक्ष्मी से मिले तो ज्ञात हुआ कि लक्ष्मी अप्रसन्न हैं और वह किसी भी स्थिति में भूतल पर आने को तैयार नहीं हैं, तब वशिष्ठ वहीं बैठ कर विष्णु की अराधना करने लगे। विष्णु प्रसन्न होकर प्रकट हुए तो वशिष्ठ ने कहा कि हम पृथ्वी पर बिना लक्ष्मी के दुःखी हैं, हमारे आश्रम उजड़ गए हैं, चौपट हो गए हैं और जीवन की उमंग और उत्साह समाप्त हो गया है।
भगवान विष्णु, वशिष्ठ को साथ लेकर लक्ष्मी के पास गए और उन्हें मनाने लगे, परन्तु लक्ष्मी नहीं मानीं और उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा कि मैं किसी भी स्थिति में भूतल पर जाने को तैयार नहीं हूं। क्योंकि पृथ्वी पर साधना और शुद्धि नहीं है। हताश होकर वशिष्ठ पुनः भूतल पर लौट आए और लक्ष्मी के निर्णय से सबको अवगत करा दिया। सभी किंकर्त्तव्यविमूढ़ थे कि क्या किया जाए? तब देवताओं के गुरु बृहस्पति ने कहा कि अब एकमात्र ‘ श्रीयंत्र साधना ’ ही बची है और यदि सिद्ध ‘ श्री यंत्र ’ बना कर स्थापित किया जाए तो निश्चय ही लक्ष्मी को आना पड़ेगा। बृहस्पति की बात से ॠषियों में हर्ष की लहर दौड़ गई और उन्होंने बृहस्पति के निर्देशन में धातु पर श्रीयंत्र का निर्माण किया और उसे मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुक्त किया और दीपावली से दो दिन पूर्व धन त्रयोदशी को उस श्रीयंत्र को स्थापित कर विधि-विधान से उसका षोडशोपचार पूजन किया।
पूजन समाप्त होते-होते लक्ष्मी स्वयं वहां उपस्थित हो गईं और बोलीं – मैं किसी भी स्थिति में यहां आने के लिए तैयार नहीं थी, यह मेरा प्रण था, परन्तु बृहस्पति की युक्ति से मुझे आना ही पड़ा। श्रीयंत्र मेरा आधार है और इसी में मेरी आत्मा निहित है। इस कथा से यह भली भांति स्पष्ट है कि श्रीयंत्र अपने आप में लक्ष्मी का सर्वाधिक प्रिय स्थान है और जहां यह यंत्र स्थापित होता है वहां लक्ष्मी स्थायी रूप से रहती ही हैं। ॠण मोचन में यह यंत्र पूर्ण सफलतादायक है। भारद्वाज ॠषि के अनुसार यह यंत्र स्वयं ही पूर्ण होता है, यदि यह श्रीयंत्र धातु निर्मित मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त हो ।

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