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दो दिवसीय Bank strike से पहले बोले राजन बाबू, जायज है ये

दो दिवसीय Bank strike से पहले बोले राजन बाबू, जायज है ये

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जालंधर। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया स्टाफ एसोसिएशन ने बैंक हड़ताल (Bank strike) को जायज बताते हुए कहा है कि सरकार को लंबित मांगों पर गंभीरता दिखानी होगी। एसोसिएशन के चंडीगढ़ सर्किल के रिजनल सेक्रेटरी राजन बाबू ने कहा है कि वेतन वृद्धि सहित अन्य मांगे नवंबर 2017 से लंबित चली आ रही हैं, जबकि इस बाबत इंडियन बैंकर्स एसोसिएशन (IBA) को एडवांस में ही मई 2017 में एक ज्ञापन सौंपा दिया गया था, लेकिन आज दिन तक उस पर सरकार कोई संतोषजनक सेटलमेंट नहीं हो पाई है। उन्होंने कहा कि शर्मनाक बात ये है कि आईबीए ने वर्ष 2018 में दो फीसदी वेतन वृद्धि ऑफर की थी उसके बाद कई मर्तबा इस विषय पर ज्ञापन सौंपे जाते रहे पर कुछ सकारात्मक नतीजे तक नहीं पहुंच पाए।

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उसके बाद IBA ने सवा बारह फीसदी वेतन वृद्धि का ऑफर दिया लेकिन एसोसिएशन ने उसे बीस फीसदी तक करने की मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि इसके साथ ही अन्य लंबित मांगों पर भी आज दिन तक कुछ नहीं हो पाया है। जिसके चलते बैंक हड़ताल करने पर मजबूर हुए हैं। बाबू ने 31 जनवरी व पहली फरवरी को होने वाली बैंक हड़ताल को जनहित में जायज करार दिया है। उन्होंने कहा है कि ये हड़ताल जनविरोधी नहीं कही जा सकती क्योंकि कोई न्यायसंगत मांग वर्षों से लंबित हो और उसे सिस्टम या सरकार जानबूझकर अनदेखी करते आए तो शोषित निवेदक कहां जाएं।


राजन बाबू ने एक बयान में कहा है कि नवंबर 2017 से 14 लाख बैंक कर्मियों की वेतन वृद्धि (Increment) लंबित है, हर बार की तरह इस बार भी सरकार ने बैंक कर्मियों के वेतन को लेकर लंबा मौन व्रत साध रखा है, हड़ताल कभी भी बैंक कर्मियों की पहली चॉइस नहीं होती, बैंककर्मी अपनी जायज मांगों को लेकर जब असहाय और मजबूर से हो जाते हैं तभी निर्विकल्प होकर अपने 14 लाख बैंककर्मियों और उसके परिवार के आर्थिक सुरक्षा के लिए हड़ताल करते हैं। उन्होंने कहा कि उसके बदले सैलरी कटवाते हैं तभी सड़कों पर उतरते हैं। सरकार की लगभग हर योजना कहीं ना कहीं बैंकर के गर्दन और पीठ पे ही लादी जाती है। काम इतने की मानो 24 घंटे भी कम पड़ जाए, समय पे काम ना हुआ तो, सुसाइड को उकसाने वाले तालिबानी इंग्लिश मीडियम जानलेवा पत्र भेज दिया जाता है। कुल मिलाकर ये मानें इधर कुआं उधर खाई है। एक पतली सी गली है, और टॉप स्पीड में गाड़ी भी चलाना और ख़बरदार जो किसी को खरोंच भी आई तो नौकरी पे जीवन-मरण का प्रश्न।

उन्होंने कहा कि नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे लोग सिस्टम के कुछ शीर्ष खिलाड़ियों के साथ मिलकर लूट का खेल खेलते हैं और बदनाम आम बैंकर्मियों को किया जाता है। ये समझने के बात है कि क्या एक बैंक क्लर्क, ऑफिसर या मेनेजर 1000 करोड़ और 10000 करोड़ का ऋण देता है, नहीं ना मगर सत्ता में बैठे कुछ लोग सर्व आम जनता को अंगूठा छाप और अनपढ़ समझने लगते हैं। राजन बाबू ने कहा कि 2016-17 में एक लाख अन्थावान हज़ार करोड़ का ऑपरेटिंग प्रॉफिट हुआ जिसमें एक लाख बीस हज़ार करोड़ अमीरों के लोन को एडजस्ट करने में चला गया। सरकार को लगता है कि गरीब वोट बैंक है और आमिर पार्टी चंदा का खजाना। 10 लाख बैंकर ना तो वोट में निर्णायक है ना चंदा देने की औकात है,इसलिए शायद हमारी फ़िक्र नहीं है। हमारे सर्विस कंडीशन में कहीं नहीं लिखा की प्रॉफिट होगा तो तभी सैलरी मिलेगी या बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि मर्जर, निजीकरण, अधिक शुल्क का विरोध बैंकों के राष्ट्रीयकरण को अक्षुण बनाए रखने के लिए जरूरी है इसलिए राष्ट्रहित में जनता-जनार्दन की सहभागिता भी अपेक्षित है, आओ इसे सब मिलकर जनआंदोलन बनाएं।

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