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बहुत प्यारा मेहमान

बहुत प्यारा मेहमान

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फिर वैसा ही मौसम है… इस छत से सूरज बहुत खूबसूरत लगता है। पश्चिम का आसमान सुर्ख है, पर इसी के साथ स्याही सारे आसमान पर फैलती जा रही है…जैसे कोई कैनवास पर रंगों से खेल रहा हो। इस छत से लगा गुलमोहर सुर्ख फूलों से भर गया है… हवा चलती है तो हरी पत्तियों के बीच लाल गुलमोहर कांप जाते हैं।

पापा की इस हवेली में मैं पूरे दस सालों बाद लौटी हूं। पापा मां रहे नहीं, भाई-भाभी विदेश चले गए। अब रिहायशी हिस्से में कोई नहीं रहता। मेरे साथ मेरा बेटा सिद्धांत और उसके पापा आए हैं। आठ साल का सिद्धांत जिसे हम प्यार से सैली कहते हैं।
घर तो वैसा ही है, पर मां-पापा के न रहने से जैसे घर की रौनक ही चली गई है। दरवाजे पर लगा नीम का पेड़… जिसके फूलों की खुशबू से सारी हवा महक जाती है। जब भी इसे देखती हूं तो मेरी आंखों के सामने इरफ़ान का चेहरा झांक जाता है। यह नीम का पेड़ मैंने और इरफ़ान ने मिलकर लगाया था और यह हमारी दोस्ती की यादगार है। इरफ़ान मेरे घर में ही रहता था पर कैसे आया, यह मुझे बाद में पता चला।
उस समय हवा में तनाव की गंध थी। नफरत की आग हर तरफ सुलग रही थी और बात-बात पर दंगे भड़क जाते थे।
हमारी हवेली शहर से काफी दूर थी। कुछ तो एकांतप्रियता की वजह से और कुछ महामारियों से बचाव के लिए हमारे पूर्वजों ने यह हवेली शहर से दूर जंगल के बीच में बनाई थी। जंगल हमारा था और इसके चारों ओर एक मील की दूरी तक कोई घर न था। हवेली के दक्षिण की तरफ काफी दूर जाकर मुसलमानों की बस्ती थी।
वे कामगार लोग थे…बेहद शरीफ से और अक्सर हमारी हवेली में काम के सिलसिले में आया करते थे। वे कपड़े सिलते थे, मकानों की चिनाई करते थे मेज कुर्सियां बनाते थे या फिर फेरियां लगा कर घरेलू जरूरत का सामान बेचते थे।
अचानक एक दिन जाने कहां से दंगाइयों का एक जत्था आया और उस मुस्लिम बस्ती में आग लगा दी गई। सारी बस्ती धू-धू कर जल रही थी। जंजीरों में बंधे पशु तड़प-तड़प कर मर रहे थे, पर उन घरों में रहने वाले पहले ही भाग कर हमारी हवेली में आ गए थे। उनमें से मजीद मियां, बब्बन चाचा और शिब्बो बिसातिन को तो मैं जानती थी। हवेली में एक बहुत बड़ा कृष्ण मंदिर था और उसके आगे बहुत बड़ा सभा भवन। उन सबको उसी में ठहरा दिया गया। हवेली का बड़ा गेट बंद कर पापा खुद बंदूक लेकर बाहर खड़े हो गए। हमारे सिपाहियों को भी बंदूकें लेकर पहरा देने को कह दिया गया था। दंगाई हवेली तक नहीं आए। कुछ तो लोग पापा की इज्जत करते थे दूसरे उनके बैरिस्टर होने से डरते भी थे। फिर वह जमीन, वह जंगल हमारा था इसलिए वहां तक आने की उनकी हिम्मत नहीं थी। पापा ने उन सभी दंगाइयों पर मुकदमे दायर करवाए, जुर्माना वसूला और बस्ती की एक-एक झोपड़ी फिर से बनवाई। इस सबमें एक महीना लग गया। तब तक वे लोग हमारी हवेली में ही रहे। बाद में सभी अपने-अपने घरों में लौट गए और तब पता चला कि अकेला इरफ़ान बचा रह गया था। उसके अम्मी-अब्बू उसी आग में जल गए थे। बिलखते इरफ़ान को पापा ने बिना किसी संकोच के बाहों में समेट लिया। वह हमारे ही घर का एक सदस्य बन गया। इरफ़ान और मैं साथ-साथ पले …बड़े हुए। हमने ढेरों पेड़ लगाए। यह दरवाजे का नीम, दाहिनी तरफ का अमलतास और यह गुलमोहर उन पेड़ों में से अब भी बचे हुए हैं।

sad_angelवे बचपन के दिन थे …मासूम शरारतों के दिन। इरफ़ान को मैं बहुत ज्यादा तंग करती थी पर वह खामोशी से हंस कर मेरी हर शरारत झेल जाता था। एक दिन मैंने ढेर सारे हरसिंगार के फूल चुने … लौट कर आई तो देखा कि वह हवेली की तस्वीर बना रहा था।
-क्या बना रहे हो तुम… ? मैंने उसकी पीठ पर धौल जमाई।
-देखती नहीं, मैं इस घर की तस्वीर बना रहा हूं। उसने कहा और पेंसिल छीलने लगा।
-पर यह तो हवेली नहीं, पानी में तैरता कोई जहाज लगता है।
– यह घर काफी ऊंचे चबूतरे पर बना है इसलिए यह तस्वीर ऐसी दिखती है।
– तुम्हें कुछ नहीं आता… तुमने मेरी तस्वीर भी गंदी बनाई थी।
-तेरी शक्ल ही ऐसी है तो मैं क्या करूं… वह खिलखिला कर हंस पड़ा। फिर धीमे से बोला था-कस्तूरी आज यह तस्वीर मैं बाबूजी को दिखाऊंगा तो बहुत खुश होंगे।

बहुत सारी यादें हैं …इरफ़ान की स्मृतियों की रेशमी परतें जब भी खुलती है हजार-हजार यादें मेरे सामने आ खड़ी होती हैं। किसी वक्त हमारा झगड़ा होता तो पापा उसी का पक्ष लेते।
कहते- कस्तूरी उससे लड़ा मत करो वह हमारा प्यारा मेहमान है। मैं चुप रह जाती, पर गुस्से से मेरी आंखें जलती रहतीं, अगर इरफ़ान प्यारा मेहमान है तो मैं क्या हूं…?
मां इरफ़ान को बिल्कुल नहीं पसंद करती थीं, पर पापा के डर से कुछ कह नहीं पाती थीं। बस मेरे ऊपर ही उनका गुस्सा उतरता था। एक दिन उन्होंने पापा को सुनाते हुए कहा था।
-धींगड़ी कहीं की …सारा दिन उसी मुसल्ले के साथ खेलती रहती है।
-इरफ़ान और मुसल्ला…? मैं खिलखिला कर हंस दी थी।
पर यही इरफ़ान जब एक दिन तेज बुखार में था तो मां सारी रात जाग कर उसके माथे पर ठंडी पट्टी रखती रही थीं।
सच कहूं तो इरफ़ान बहुत प्यारा था। उसका हल्का सांवला रंग, गहरी काली आंखें, माथे पर सोच की लकीरें और उसकी जहानियत। हमारी गहरी दोस्ती मां की नाराजगी का कारण बनी और इरफ़ान आगे की पढ़ाई के लिए बनारस भेज दिया गया। जाने से पहले वह मेरे स्टडी रूम में आया था उसकी आंखें भरी-भरी थीं। उसने जल्दी-जल्दी विदा ली थी और चला गया था। कार जब तक आंखों से ओझल नहीं हो गई वह मुड़कर देखता रहा था।
इरफ़ान से प्यार मुझे उसके जाने के बाद हुआ। कितनी बार मैंने उसे याद करके आंखें भर ली थीं। समय गुजरता गया …इरफ़ान फिर लौटकर नहीं आया…या शायद आने ही नहीं दिया गया। बढ़ती हुई नीम की कोमल पत्तियां उतनी ही सुंदर थीं, गुलमोहर पर अब भी लाल सुर्ख फूल झूमते थे, अमलतास मौसम में सिर से पांव तक गहनों जैसे पीले फूलों से लद जाता था, पर मेरी आंखों में सिर्फ खाली पन था। रात को मेरे सामने चमकीले तारों से भरा आकाश होता पर हर तारे में मुझे इरफ़ान का चेहरा झांकता दिखाई देता। एक दिन पापा को मां से कहते सुना था-इरफान नौकरी से लग गया, मेरी जिम्मेदारी खत्म हुई। धीरे-धीरे उस घर में मुझे छोड़कर जैसे बाकी सब इरफ़ान को भूल ही गए। मेरा विवाह हुआ और साल भर बाद जब मेरा सैली आया तो मैं हैरान ही नहीं स्तंभित हो उठी। उसकी गहरी काली आंखों में स्पष्ट ही इरफ़ान की झलक थी…खुदाया किसी मां का तसव्वुर क्या इस तरह फलता है?
अब सैली बड़ा हो रहा है…उसके माथे पर वही सोच की लकीरें हैं जो कभी मैंने इरफान के चेहरे पर देखी थीं। रवि अक्सर कहते हैं-हमारा यह बेटा सांवला कैसे है जबकि हम-तुम दोनों ही गोरे हैं, पर कुछ भी कहो यह है बहुत खूबसूरत इसकी आंखें किसी दार्शनिक की तरह लगती हैं।
रवि और सैली लौट कर आए हैं। आते ही रवि ने कहा- देखिए आपके साहबजादे ने क्या शाहकार बनाया है। इसने बड़ी खूबसूरत तस्वीर बनाई है…यह तो अनोखा चित्रकार है कौन है यह इतना खामोश, इतना समझदार।
मैंने हैरान होकर तस्वीर देखी …वही पानी पर तैरते जहाज जैसी हवेली की तस्वीर मेरी आंखें भर आईं मैंने एक पल सैली को देखा वही माथे पर सोच की लकीरें…वैसी ही खोई-खोई आंखें मैंने उसे करीब खींच लिया है।
-रवि यह हमारा मेहमान है बहुत प्यारा मेहमान।

-रेणु श्रीनिवास

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