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परदेस की गलियां

परदेस की गलियां

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मंगल का दिन था जाने क्या बात थी कि इस दिन शहर से सात लाशें उठीं। ऐसा लगा जैसे श्मशान जाग गया हो। कोई एक्सीडेंट नहीं हुआ था। बस वैसे ही लोग एक के बाद एक मरते चले गए। कोई हार्टअटैक से, कोई निमोनिया से और कोई ब्रेन हैमरेज से। बहाना मौत के आने का सबके साथ था, पर इस तरह एक ही दिन इतने लोगों का मर जाना सबको हैरत में डाल गया था। श्मशान घाट पर करीब पांच सौ के लोग थे। मरने वालों के परिजन….कुछ सुबकते, कुछ आंखें पोंछते कुछ निर्विकार भाव से जलती चिताओं को देखते हुए। जिंदगी का सच यही है मौत और कुछ नहीं फिर आदमी ढेरों ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए इतनी हायतौबा क्यों मचाता है…। यही सोचते सारी रात मुझे नींद नहीं आई। आधी रात को एक बच्चा ठुनकता हुआ उठ गया और मेरी फिर आंख खुल गई। इस शहर की आबादी घनी है इसलिए एक हफ्ते में एक-दो लोग मर ही जाते हैं पर इस तरह एकसाथ मरने की बात पहली बार सामने आई थी। सुबह तक जाकर मेरा मन थोड़ा सा सामान्य हो पाया।

feri6इस छोटे से शहर में जैसे गलियों का नेटवर्क फैला हुआ है। जब भी ठंड का मौसम आता है तो इन्हीं गलियों से गुजरते कश्मीरी फेरी वाले दिखाई देते हैं। खूबसूरत, लंबे और नीली आंखों वाले। ठंड के मौसम में रोज का जैसे नियम ही है कि औरतें धूप में बैठी होती हैं। कोई सब्जी काट रही होती है कोई स्वेटर बुन रही होती है।
आज भी गुनगुनी धूप थी… बच्चे आंगन में खेल रहे थे और औरतें रोज की तरह बातों में व्यस्त थीं।
धूप में बैठी औरतों ने सामने से गुजरते फेरी वाले को बुला लिया था। अक्सर दो फेरी वाले साथ चले होते हैं, पर यह अकेला था। वह गेट से अंदर आया, शालों वाला बंडल खोला और औरतें झुक कर देखने लगीं।
-ये शॉल कितने का है? एक ने सफेद शाल उठाया जिस पर बेहद सुंदर गुलाब के फूल कढ़े हुए थे।
-सात सौ का है।
-क्या बात करते हो अभी पीछे ऐसे ही शाल साढ़े तीन सौ में दे कर गया।
-वह शाल नहीं स्टॉल रहा होगा। फिर कपड़े का भी फर्क होता है… उसने धीमे से कहा। उसके माथे पर सोच की लकीरें थीं।
-अरे नहीं जी अच्छा भला शाल था। तुम लोग हमेशा बढ़ा कर कीमत बताते हो ।
feriलगता था औरतें फेरी वाले को लूटने की ही तैयारी में थीं। वे लगातार उस पर दबाव डालती रहीं कि वह शालें कम दाम में दे। शायद इस बीच सौदा पट गया। कुछ ने खरीदा, कुछ उठ कर चली गईं। इस बीच मैं भी बाहर निकल आई।
– आप भी कुछ ले लीजिये उसने मुझे देख कर कहा।
मेरी निगाहें भारी कढ़ाई वाले नीले सूट पर चली गईं।
– यह कितने का है ?
-बारह सौ का… हिचकते हुए उसने कहा।
-इतना तो मेरे बजट में नहीं है… सॉरी ।
-कितनी इज़ाज़त देता है आपका बजट ? वह फीकी हंसी के साथ बोला।
– यही कोई 600 इससे ज्यादा नहीं।
– आप 620 दे दीजिये उसने सूट मेरे हाथ में थमा दिया। पैसे लाने को मैं अंदर गई।
-हजार का नोट है, आपके पास टूटे होंगे ?
उसने पहली बार चेहरा उठाकर मुझे देखा जैसे यकीन न कर पा रहा हो कि मैं भी उन्हीं औरतों के बीच की थी।
– हां जी हैं। हंस कर उसने अपना पर्स निकला हिसाब कर बचे रुपये मुझे दिए। अब मैंने उसका उतरा हुआ चेहरा देखा।
-चाय पियोगे? …ठंड काफी है।
-हां बना दीजिये…उसने बिना किसी संकोच के कहा।
मैं दो कप चाय ले कर आई। एक उसे थमाया और अपनी चाय ले कर वहीं कुर्सी पर बैठ गई।
-कश्मीर में बाढ़ आई तो तुम कहां थे ?
-ऐसे ही फेरी लगाने गया था। वापस आया तो सब कुछ ख़त्म हो चुका था। उसकी नीली आंखें सजल थीं।
-घर के सब लोग …?
-सब हैं …बच गए, बस घर और कमाने का जरिया ख़त्म हो गया।
-कोई बात नहीं सब ठीक हो जायेगा। सब्र करो तुम्हारा काम अच्छा है… हिम्मत नहीं हारते।
feri-2-आप बहुत अच्छी हैं। उसने कप रख दिया।
-इस बार मेरे लिए शाल ले आना, याद रहेगा न।
-जरूर आपके बजट में ही लाऊंगा। वह बच्चों जैसी हंसी हंस दिया। उसने अपना सामान समेटा और चला गया।
कहना न होगा कि कुछ दिन बाद वह फिर आया और मेरे लिए पश्मीने की शॉल लाया। इस बार शॉल बजट में ही था।
मौसम बदल गया है… फेरी वाले कशमीरी शहर से जा चुके हैं। और मेरे मन में बार-बार यही बात आती है कि परमात्मा जब कुछ गलत करता है तो अपने सबसे अच्छे बच्चों को क्यों भूल जाता है ?
कश्मीर को , उसकी पीड़ा को हम कितना जानते हैं। क्या जो कुछ फेसबुक और टेलीविजन पर दिखता है वही कश्मीर है…? क्या हमने कभी सोचा कि इस तरह अपना घर और आय के साधन खोकर सर्वहारा हुए कितने लोग रोजी-रोटी कमाने के लिए इस तरह अपनी आजीविका कमाने के लिए जगह-जगह धक्के खा रहे हैं। उनके पास भी परिवार है और उसे उन्हें जिंदा रखना है।
यही सोचा था उस दिन …मैंने उसका नाम नहीं पूछा था पर उसका उदास चेहरा मुझे आज तक याद है ।

– प्रिया आनंद

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