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हवेली का मुहल्ला

हवेली के पीछे एक लाइन में बने हुए दस घर

हवेली का मुहल्ला

ख्वाब जहां से उठे थे वहीं जमींदोज़ हो गए थे। हालांकि हवेली के पीछे एक लाइन में बने हुए दस घर थे पर उन्हें मिला जुला कर सर्वेंट क्वार्टर ही कहा जाता था। साधारण सुविधाओं वाले वन रूम फ्लैट तब चित्रा सोचा करती थी कि इन लोगों के लिए दो कमरों का इंतजाम क्यों नहीं किया गया, कैसे रहते होंगे ? यह आजादी से दो साल पहले की बात थी, पर आज भी नई सी लगती है।
अपनी बीमारी की वजह से सिर्फ अपने बिस्तर तक सिमट कर रह गई है चित्रा, पर बचपन के दौर से लेकर आज तक की स्मृतियां उसके मन में जीवंत हैं।
अपनी ही अंतरंगता में डूबी चित्रा …. बाहरी दुनिया उसे जाने क्यों बेहद बदसूरत सी लगने लगी है। उसके जेहन में हमेशा मायके की हवेली मौजूद रहती है । खूबसूरत कार्निसों और महराबों से सजी हुई। समूचे पत्थरों के डबल खंभों पर टिकी बारादरी और उसके चारों ओर कामिनी और मालती के फूलों की सुगंध। चित्रा की छोटी बहन सफेद कुर्ता पैजामा पहने ,गांधी टोपी लगाए सड़क पर बच्चों की टोली का नेतृत्व करती चलती थी ।
कहती हैं अम्मा मुहम्मद अली की
जान बेटा खिलाफत पे दे दो
बच्चे बुलंद आवाज के साथ ही दोहराते
कहती हैं अम्मा मुहब्बत अली की
जान बेटा खिलाफत पे दे दो
अरे बेवकूफों मुहब्बत अली नहीं मुहम्मद अली , घामड़ कहीं के वह जोर से डांटती।
इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते जुलूस आगे बढ़ जाता । कच्चे बांसकी टहनियों पर कागज के तिरंगे झंडे हवा में फड़फड़ाते। बच्चों की इस टोली को अंग्रेज सरकार के सिपाही पकड़कर कार में ठूंस देतेऔर दो तीन किलो मीटर दूर लेजाकर छोड़ देते । जहां से यह बचकानी टोली फिर इंकलाब के नारे बुलंद करती वापस आ जाती। इन बच्चों में सर्वेंट क्वार्टर के बच्चे भी शामिल थे। चित्रा के होंठों पर मीठी सी मुस्कुराहट आ गई।
-मां हंस रही हैं सिरहाने खड़े बेटे ने कहा।
ये नोस्टेलेजिया के दौर से गुजर रही हैं डॉक्टर ने धीरे से कहा।
चित्रा कोई प्रतिक्रया नहीं व्यक्त करती ।
उसके सामने यादों का समंदर है जिसकी हर उठती लहर में कोई पहचाना चेहरा झांक कर आवाज दे जाता है।
अवध के इस ऐतिहासिक नगर से काफी दूर घने जंगलों के बीच यह हवेली उसके पूर्वजों ने बहुत सोच समझ कर बनवाई थी। उसकी साफ-सफाई और घर के काम करने के लिए नौकरों की पूरी फौज थी। इसी अमले के लिए सर्वेंट क्वार्टर अस्तित्व में आया। कितने ही नौकर नौकरानियां और उनके बच्चे जो आज भी उसकी यादों का मजबूत हिस्सा हैं । चित्रा की स्मृतियों में दो नौकरानियों का नाम ज्यादा आता है, शिवरानी और पियारी …. नाम तो उसका प्यारी ही रहा होगा पर बिगड़ कर पियारी हो गया था। शिवरानी का ब्याह हुआ और वह अपनी ससुराल चली गई। पियारी देखने में खूबसूरत थी इसलिए थोड़ी नखरीली भी थी। हर समय बनने संवरने में ही व्यस्त रहती। मन में आता तो काम करती ,नहीं तो नहीं। उस दौर में ज्यादातर पुरुषों को हवेली के अंदर आना मना था इस लिए वे बाहर से ही पुकार लेते थे।
सुबह दस बजे का वक्त रहा होगा पियारी शीशा कंघी लेकर आंगन में बैठी अपने बाल संवार रही थी । नौकर ने बाहर से कई आवाजों दीं, पर उसने सुना नहीं ।वह चिढ़ कर बोला
-अरे प्राणपियारी बोलतीं काहे नाहीं, दिखाई तो देत हो।
फिर तो मानो विस्फोट ही हो गया। पियारी अगिया बैताल हो गई।
-मुंह झौंसे,नासपीटे,तोका हैजा होइ जाय,मुंह मा कीड़ा पड़ें।
एक मुंह हजार गालियां ।।।नौकर सकपका कर भाग खड़ा हुआ।
चित्रा की आंखें बंद हैं स्मृतियां फिर वहीं लौट जाती हैं जहां उन्हें छोड़ा था। शिवरानी ससुराल से वापस आई । वह भी पियारी की मनमानी से तंग आ जाती थी।कभी वह बिना खाए सो जाती तो शिवरानी को ही उसे खिलाना पड़ता।
उसकी यह दादागिरी बहुत दिनों तक चली नहीं उसकी भी शादी हुई और उसे भी जाना पड़ा। इस तरह रामप्यारी या प्राणप्यारी रुखसत हो गईं।
सर्वेंट क्वार्टर की ये छोटी-छोटी घटनाएं हैं। जिन्हें चित्रा ने बार-बार दोहराया है।
उमराई घर में आया के तौर पर आई। आज का वक्त होता तो चित्रा उसे पक्का उमराव जान का नाम दे देती।
आजादी मिली, पर आजादी की भारी कीमत मानवता ने अदा की । चित्रा के पिता जी बटवारे में हुए नरसंहार से दुःखी थे पर मां को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा था। वे न पिता जी की आजादी की लड़ाई में रुचि लेती थीं और न अब उनके दुःख में शामिल थीं। उनका दायरा घर के अंदर तक ही सीमित था । फिलहाल उमराई घर की साफ सफाई के लिए रखी गईं। उस जमाने में नौकरों का वेतन बहुत कम होता था। खाने पीने की व्यवस्था से वे मुक्त थे क्योंकि वह उन्हें घर से ही मिल जाता था। एक बार मां ने पूरे घर की सफाई करवाई और मजदूरी में उसे छः पैसे दिए। उमराई कुएं पर पानी भरने गई तो कमीज की ऊपरी जेब में रखे पैसे उसके झुकते ही कुएं में डुबकी लगा गए। उमराई की सारी मेहनत पानी में चली गई। वह वहीं कुएं की जगत पर बैठकर रोने लगी। मां को खबर मिली तो भाग कर उसके पास पहुंचीं और सारा मामला जान कर उसे फिर से पैसे दिए।
चित्रा को ढंग से नींद नहीं आती। आती है तो बस टुकड़ों में । अक्सर वह अंधेरे में भी जागती रहती है।
नौकरानियों में सुमना भी थी, जिसे दादी सुमनी बोलती थीं। रंग सांवला था पर नक्श बेहद तीखे थे । एक बार बड़ी दीदी की सासू मां शहर में तीर्थ करने आईं तो चित्रा भी दीदी के साथ उनसे मिलने गई।लौट कर आई तो मां ने पूछा -सास कैसी हैं ?
-सुमना जैसी… उसने तपाक से उत्तर दिया।
-ऐसा नहीं कहते वे तुम्हारी दीदी की सास हैं और सुमना नौकरानी है ।
-तो फिर उन्हें गोरा होना चाहिए था।
मां के चेहरे पर हल्की हंसी फैल गई। इस तर्क का जवाब भी क्या था।
पत्ती कहारिन सुमना के बाद आई। वह घरेलू काम के लिए रखी गई। पत्ती का हर काम बड़े करीने से होता था। भुजिया चावल वह इतना रगड़ -रगड़ कर धोती, कि उसका रंग हल्का गुलाबी रह जाता। आटा गूंथने में तो उसको महारत हासिल थी।वह आटे में पानी डालती और पलट-पलट कर दोनों मुट्ठियों से आटा गूंधती जाती। पत्ती की दिनचर्या का एक ड्रॉ बैक भी था । वह जहां दाल चावल धोती थी, वहां फिर पानी डाल कर साफ नहीं करती थी। उस पर लोग अक्सर फिसल जाते थे। एक दिन पत्ती उस वैतरणी में खुद गिरकर धराशायी हो गईं।
चित्रा के होठों पर हल्की हंसी है।
-मां क्या हुआ …? बेटे ने कान के पास झुक कर कहा।
-सर्वेंट क्वार्टर … चित्रा ने धीमे से कहा फिर गहरी नींद में डूब गई। होंठों पर शब्द थरथराए।।।सिमी को बुला दो।
सिमी चित्रा की सबसे छोटी बहन है। कुछ बातें चित्रा उसी से कहती है किसी और से नहीं।
पत्ती के जाने के बाद गुलाबकली और उसकी बेटी अनारकली घर में काम करने के लिए आईं,पर जल्दी ही हवेली में उनका नाम बदल कर गुलाबो और अनारो हो गया। सब लोग चौके में एक साथ बैठकर खाना खाते थे। खाने से पहले और बाद में हाथ-मुंह धुलाने का काम गुलाबो और अनारो का था। एक दिन गुलाबो का भाई उससे मिलने को आया। गुलाबो ने बड़े प्रेम से नीम के नीचे चूल्हा जलाकर उसके लिए खाना बनाया।
खाा खाने बैठे भाई ने पहला निवाला मुंह में डाला तो उसका मुंह कसैला हो गया।
-यह क्या तूने दाल में नीम का पत्ता डाला है …?
– अरे क्या मैं पागल हूं। इतने मन से खटाई डालकर छौंक लगा कर दाल बनाई है।
भाई सूखा भात अचार से खा कर चला गया। बाद में गुलाबो खाने बैठी तो दाल में कड़वी नीम का स्वाद था। पतीली का ढक्कन उठा कर देखा तो दाल में नीम की छाल पड़ी थी और खटाई नीचे रखी थी। यह बात काफी दिनों तक घर में कहानियों की तरह चलती रही।
बीमार चित्रा ने जैसे बिस्तर को ही अपना संसार मान लिया है । वह चुपचाप लेटी है ।।।एक के बाद एक चेहरे आंखों के सामने से गुजरते जाते हैं। धरमा बारिन, नइकी बारिन और राधे बहू। धरमा नृत्यकला में पारंगत थी और कोई मौका मिल जाने पर वह खूब थिरकती थी। चेचक के प्रकोप में राधे बहू को छोड़कर सब काल कवलित हो गईं। भानी बहू उसके बाद आई उसका पति पल्टन में था उसके पति का नाम भवानी प्रसाद था जिसका नाम हवेली में भानी हो गया था। भानी बहू ने एक अर्से तक काम किया फिर अपने पति के साथ चली गई।
इसके बाद आई ओरौनी बहू ने हवेली में मरते दम तक काम किया। हवेली की बारादरी के बड़े हॉल कमरे के चारों ओर का फर्श कच्चा था और इसकी सफाई-लिपाई का काम ओरौनी बहू ही करती थी।इसी मेन हॉल में तथा उसके चारों ओर जगह-जगह कक्षाओं के लिए स्थान सुनिश्चित थे और पाठशाला यहीं चलती थी । बच्चे ओरौनी बहू के कहने पर वहां से हट जाते थे जबकि बड़े गुरू जी के धमकाने पर भी नहीं सुनते थे।
शाम चित्रा की आंखें खुलीं तो सिमी सामने थी। उसके पति ने फोन करके सिमी को बुला लिया था।
– सिमी मेरी एक बात मानोगी। कल हवेली चली जाओ, वहां देखना कि अब हवेली कैसी लगती है गांव में हर उस आदमी से मिलकर आना जिनके घरवालों को मैं जानती थी। रात खाना खाने के बाद सिमी जब बहन के पास लेटी तब चित्रा ने कहा।
अगली सुबह सिमी बस से चली गई। चार घंटे के सफर के बाद वह उस हवेली के सामने थी जो उसके पूर्वजों का घर था और उसकी चित्रा दी के सपनों का संसार।
अजीब हालत थी वहां ।बचपन की यादों में प्रमुख स्थान रखने वाले कैथा और बेल के पेड़ कट चुके थे। वहां नए फ्लैट बन गए थे । प्राइमरी स्कूल छत सहित नीचे आ गिरा था। बिखरी हुई ईंटों के बीच स्तब्ध सी खड़ी सिमी देखती रह गई। बीस-पच्चीस सालों से तो वह भी यहां नहीं आई थी। सर्वेंट क्वार्टर की दीवारें आधी ही बची थीं । शामिलात के रसोईघर की छत गायब थी उसके बीचोबीच एक बड़ा सा जंगली पेड़ उग आया था जिस पर गिलहरियां इधर से उधर भाग रही थीं । वहां चिड़ियों और गिलहरियों का जमावड़ा था । हां बारादरी वैसी की वैसी ही थी पत्थर के खंभों पर टिकी बारादरी और अंदर मंदिर में भगवान मुरलीधर सही सलामत थे । उतनी विशालकाय आलीशान हवेली का बस यही हिस्सा बचा हुआ था । वह पलट कर वहां लौटी जहां से होकर मां के कमरे तक सीढ़ियां जाती थीं। यहां उसका भी बचपन बीता था। दुमंजिले का आधा बरामदा गिर गया था। पैर रखते ही पूरा बरामदा हिल गया। किसी तरह वह मां के कमरे तक पहुंच गई। उस कमरे की खिड़कियों के सींकचे गायब थे । खाली खिड़कियों को देख कर दहशत होती थी। कमरे के बीचोबीच एक बड़ा सा सुराख बन गया था जिससे निचली मंजिल का अंधेरा दिखता था। किसी वक्त यहीं खिड़की के पास बैठकर चित्रा दी कविताएं लिखती थीं। खंडहर में बदल गए उस घर की फर्श धूल से अटी पड़ी थी जिस पर सांपों के रेंगने के निशान थे। एक आले पर एक बुझा हुआ दिया रखा था।
हताश मन से सिमी हवेली से बाहर आ गई। वहां से वह थोड़ी दूर पर बसे गांव में गई। सर्वेंट क्वार्टर के कुछ लोगों के वंशज वहां भी रहते थे।
गांव काफी विकसित हो चुका था प्राइमरी स्कूल में उसके और चित्रा दी के साथ पढ़ने वाले बच्चे अब बुजुर्गियत की राह पर थे। उनके बच्चे बाहर नौकरियां करते थे और वे अच्छे घरों में पूरी सुख सुविधाओं के साथ रहते थे। घरों की शैली बदल गई थी सड़कें पक्की थीं और उनके किनारे लैंपपोस्ट नहीं पोल लाइट्स थीं। हां,गांव के बीच में खड़े बरगद के नीचे का शिवाला वैसा ही था बस उसके चारों ओर चबूतरा बना दिया गया था।
सिमी लौट कर आई तो चित्रा ने हसरत से पूछा -कहां -कहां गई थीं और किससे-किससे मिलीं ?
– दी हवेली में बारदरी को छोड़कर सब कुछ तबाह हो चुका है।सर्वेंटक्वार्टर की ईंटें चारों ओर बिखरी हैं। घर के बीच में पेड़ उग आया है । वहां चिड़ियों ,गिलहरियों और सांपों ने डेरा जमा रखा है। मां का कमरा बहुत बुरे हाल में है आधी फर्श गायब है और खिड़कियां सींकचों से खाली हैं। हां,गांव बहुत अच्छा हो गया है।
-रहने दे चित्रा ने आंखें बंद कर लीं और करवट बदल कर सो गई।
सर्वेंट क्वार्टर एक ऐसा मुहल्ला था जो हवेली में ही आबाद था । अब न हवेली वाले ही रहे और न वह मुहल्ला। सिमी को हैरानी जरूर थी कि जिस सर्वेंट क्वार्टर के बारे में जानने के लिए चित्रा दी इतनी उत्सुक थीं उसकी पूरी तफ़सील भी उन्होंने क्यों नहीं जाननी चाही …

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