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चूहे ने बचाई जान

चूहे ने बचाई जान

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राजू जिस गांव में रहता था उसके पास ही एक घना जंगल था। उस घने जंगल में गांव के लोग रोज लकड़ियां काटने जाते थे। हां, वहां बच्चों को जाने से मना किया जाता था। राजू की नानी इसी जंगल के आखिरी छोर पर रहती थी। वह नानी के पास जाना चाहता था पर मां जाने नहीं देती थी। एक दिन वह चुपचाप जंगल में चला गया। सच यह था कि राजू की नानी मानव नहीं बल्कि एक राक्षसी थी। घने जंगल की पगडंडी पर चलता राजू नानी के दरवाजे पर पहुंच गया। उसने अपना परिचय दिया तो वह बहुत खुश हुई।

rat3उसने राजू को बैठने को कहा और उसके लिए खीर बनाने लगी। खीर बनाने के बाद एक कटोरे में उसने राजू को दिया और उसे वहीं लगे झूले पर बैठा दिया और उसके हाथ में एक छोटी सी ढोलक देकर बोली- यहीं झूला झूलते रहो और यह ढोलक बजाते रहो तब तक मैं पड़ोस से आटा पीस कर आती हूं। नानी घर से बाहर चली गई। खीर बड़ी अच्छी बनी थी राजू को मजा आ गया। वह खीर खाता रहा और ढोलक बजाता रहा। अचानक एक चूहे ने झूले के ऊपर से झांका।

-क्या कर रहे हो दोस्त…?
-खीर खा रहा हूं और झूला झूल रहा हूं।
-मरना है क्या…? ये जो तुम्हारी नानी है, वह राक्षसी है और आज इसका शिकार तुम हो। मेरा विश्वास न हो तो वह गाना सुनो जो वह आटा पीसते हुए गा रही है।
राजू ने ढोलक बजाना छोड़कर ध्यान से सुना। सचमुच नानी गा रही थी…
आटा पीसूंगी रोटी पकाऊंगी बच्चे का नरम-नरम मांस खाऊंगी।

rat7-अब मैं क्या करूं… ? राजू के पसीने छूट गए।
-ऐसा करो खीर वहीं छोड़ो और ढोल मुझे दो। मैं इसे अपनी पूंछ से बजाता रहूंगा साथ में ये तीन छोटी मटकियां लेते जाओ। इनमें आंधी, आग और पानी बंद है।

जब वह तुम्हारा पीछा करे तो पहले आंधी वाली, फिर आग और सबसे बाद में पानी वाली मटकी खोल देना। वह पानी को पार नहीं कर पाएगी। कहते हुए चूहे ने झूले से बंधी तीनों मटकियां काट कर राजू को दे दीं। राजू वहां से भाग निकला और चूहा झूले पर बैठ कर पूंछ से ढोल बजाने लगा
ढोल के बजने की आवाज हल्की थी इसलिए राक्षसी को लगा कि शायद राजू सो गया है वह यही देखने के लिए घर लौटी। उसे घर में आता देख कर चूहा भाग कर झूले के ऊपर जा छिपा। राक्षसी ने देखा झूला खाली है। ढोल और खीर का कटोरा भी वहीं रखा है।

rat5राक्षसी ने बाहर निकल गई। राजू ने उसे आते देखा और तेजी से भागने लगा। वह अब सचमुच राक्षसी बन गई थी। राजू ने आंधीवाली मटकी खोल दी… तेज हवा में जैसे सब कुछ उड़ने लगा पर राक्षसी वह तेज आंधी पार कर गई। अब राजू ने आग वाली मटकी खोली …आग ने थोड़ी ही देर उसका रास्ता रोका और वह जलती आग में से भी बाहर निकल आई। और कोई चारा न देख राजू ने आखिरी मटकी खोली और उससे निकला पानी एक नदी में बदल गया। अब उस पार राक्षसी थी और इस पार राजू और थोड़ी ही दूर पर जंगल खत्म हो जाता था। राजू ने जल्दी से जंगल पार किया और अपने घर आ गया।
-कहां थे तुम…? मैं कितनी देर से ढूंढ रही थी। मां ने पूछा।
– कहीं नहीं, यहीं तो था मां, बस घर के पास ही। राजू ने हंसते हुए कहा, पर उसी के साथ उसे अपने चूहे दोस्त की भी याद हो आई। सचमुच वह अच्छा दोस्त था।

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