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स्वर्ग का रास्ता

स्वर्ग का रास्ता

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अपने खेतों से काम खत्म कर थका हारा भोला जब घर की ओर लौट रहा था तो उसने जमींदार के घर से पंडित जी को निकलते देखा। पीली धोती और रुद्राक्ष की माला पहने तिलक लगाए पंडित जी उसे साक्षात देवता जैसे ही लगे। पंडित जी के झोले दान-दक्षिणा के सामान से भरे हुए थे।


-परनाम पंडित जी कहां से आ रहे हो आप … उसने झुक कर पंडित के पैर छू लिए।
-जमींदार के यहां कथा करने गया था।
-कथा कराने से क्या होता है..?
-सीधे स्वर्ग की सीढ़ियां खुल जाती हैं। सारे पाप धुल जाते हैं।
-फिर तो मेरे यहां भी किरपा कीजिए। सामान क्या-क्या लगेगा बता दीजिए। पंडित जी ने वहीं सामान की लिस्ट बनाई और भोला को थमा दिया और अगले दिन आने का वादा करके अपना सामान संभालते हुए चले गए।
भोला घर आया तो बेहद उत्साहित था पत्नी से बात कर उसने सारी तैयारियां कर लीं। हालांकि उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह पंडित जी की कथा को समझेगा कैसे क्योंकि वह तो पूरी तरह अनपढ़ ही था।
अगले दिन पंडित जी सुबह समय पर आ गए। घर की साफ-सफाई और भगवान के लिए मंडप बना देख खुश हुए। फिर उन्होंने अपने झोले से भगवान को निकाल कर मंडप में स्थापित कर दिया। पूजा शुरू हुई।
-अब मैं कैसे पूजा करूं मैं ठहरा अनपढ़ … ? भोला अब भी उलझन में था।
– इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है। बस जो कुछ मैं बोलूंगा वही बोलते जाना, जैसा करूं वैसे ही करते जाना।
– फूल चढ़ाओ। पंडित जी ने धूप जला कर कुछ मंत्र पढ़ने के बाद कहा।
– फूल चढ़ाओ। भोला ने फौरन दोहराया।
-मैंने तुमसे कहा है… फूल चढ़ाओ, पंडित जी झुंझला गए।
-मैंने तुमसे कहा है फूल चढ़ाओ … भोला एकदम तैयार था।
-बेवकूफ.. कहीं का, आता तो कुछ है नहीं कथा क्या करेगा।
-बेवकूफ कहीं का आता तो कुछ है नहीं कथा क्या करेगा भोला ने जोर से कहा।
पंडित जी का पारा एकदम से चढ़ गया उन्होंने अपनी लाठी भोला पर दे मारी। भला भोला भी क्यों देर करता उसने भी वही लाठी खींच कर पंडित को दे मारी।
गुस्से में पंडित उठ पड़े और अपने घर की ओर चल दिए। भोला ने सोचा कि कथा खत्म हो गई। पंडित की लाठी का दर्द अभी भी बाकी था।
-कथा तो हो गई अब दान दक्षिणा का सामान तुम दे आओ। मैं नहीं जा सकूंगा मेरी पीठ में दर्द है।
भोला की पत्नी ने दो थालियों में दान की सामग्री अनाज, कपड़े आदि रखा और पंडित के घर की ओर चल दी। वहां पहुंच कर उसने हाथ जोड़े और सामान जमीन पर रख दिया। वहां पंडिताइन अपने पति के अपमान से गुस्से में भरी बैठी हुई थीं। उसने वहीं कोने में रखी लाठी उठाई और भोला की पत्नी की भी मरम्मत कर दी। वह कराहती हुई घर लौटी तो भोला चारपाई पर लेटा कराह रहा था।
-सुनो कथा सुनने में ही नहीं दान देने में भी बड़ी मेहनत है। भोला की पत्नी ने कराहते हुए कहा।
-कुछ भी हो स्वर्ग जाने की राह तो खुल गई। वह संतुष्ट था।

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