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जादू के कंकड़

जादू के कंकड़

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इंदु एक छोटी सी कुटिया में मां के साथ रहती थी। इंदु की मां फूलों का हार-गजरा बनाकर बेचती थी और अपना घर चलाती थी। इंदु स्कूल जाती थी और मां के काम में भी हाथ बंटाती थी। एक दिन इंदु की मां बीमार पड़ गई। इंदु उसे डाक्टर के पास ले गई। डाक्टर बोले, इन्हें सख्त आराम की जरूरत है। आंखों पर जोर पड़े ऐसा कोई भी काम करने नहीं देना और घर के बाहर भी जाने मत देना। डाक्टर ने दवाइयां लिखकर दीं। मां और इंदु के सामने सवाल उठ खड़ा हुआ, अब क्या करें ? पहले से हीघर में गरीबी, उस में आराम और दवाओं का खर्चा यह सब कैसे होगा?

इंदु तो रो पड़ी। फिर मां और भी चिंता में पड़ जाएगी, इसलिए वह बाहर आ गईऔर एक पत्थर पर बैठकर रोने लगी। तभी सामनेवाले पहाड़ी मंदिर में से घंटी की आवाज उसके कानों में पड़ी। वह झट से खड़ी हो गई और मंदिर के तरफ भागने लगी। ईश्वेर के सामने हाथ जोड़कर अपनी परेशानी बताने लगी। तभी उसकी पीठ पर किसी का प्यार से हाथ फिरने लगा। उसने पिछे मुड़कर देखा, तो एक बूढ़ी मां पीछे खड़ी थी। वो उसे कहने लगी, रो मत बेटी, मैंने तेरी बातें सुन ली हैं। पर तू तो काम कर सकती है और मेहनत कर के पैसे भी कमा सकती है।
उस पर इंदु बोली, मैं तो छोटी हूं और स्कूल भी जाती हूं। फिर मैं कैसे काम कर पाऊंगी? बूढ़ी मां ने मंदिर में ही आसपास दिखने वाली चींटियों को दिखाते हुए कहा, इन्हें देख! कितनी छोटी हैं। फिर भी कितने अनाज के दाने ले जाती हैं। क्योंकि उनके पास विश्‍वास, जिद्द और मेहनत ये तीनों चीजें हैं इसलिए वे ऐसा कर सकती हैं।
-पर मुझ में तो वे सारे गुण नहीं हैं, फिर मैं कैसे करूंगी ?
बूढ़ी मां हंसी और बोली- ये देख, मेरे पास ये जादू के कंकड़ हैं
उन्हों ने मटके में से तीन पत्थर उठाए और कहा, इस में से एक पत्थर तुझे आत्मविश्वाास देगा। दूसरा जिद्द और तीसरा मेहनत करने की शक्ति देगा। इन्हें सदा अपने पास रखना पर मां कहती है, किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना इंदु ने कहा। पर ये तो पैसे-हीरे या सोना-चांदी का मामला नहीं है। सिर्फ पत्थर हैं और तुम्हारा काम खत्म होने पर और मां ठीक हो जाने पर मुझे वापस कर देना।
इंदु को बात सही लगी। उसने कंकड़ ले लिए। बूढ़ी मां को नमस्कार किया और घर लौट आई। उसने मां को कुछ बताया नहीं। उसे डर था कि, मां गुस्सा करेगी। इंदु अब वे कंकड़ हमेशा अपने पास रखने लगी। वह रात के समय हार-गजरे बनाने लगी। सबेरे जल्दी उठकर उसे बाजार में बेचने के लिए ले जाने लगी। स्कूल से आते समय फूल लाने लगी। रात में हार-गजरे बनाकर सबेरे बेचने लगी। ये सब भी उसे अच्छी तरह आ गया। उसे अच्छे पैसे मिलने लगे। उस में से कुछ पैसे अलग रखकर वह फूलों के बीज खरीद लाई और घर केआंगन में बो दिया। कुछ दिनों बाद पेड़ उग गए। उसमें फूल भी आने लगे। अब इंदु को बाजार से फूल लेने की जरूरत नहीं थी। उसे पैसे अधिक मिलने लगे। उन पैसों से मां की दवा लाने लगी। मां ठीक हो गई।
एक दिन इंदु बहुत ही परेशान थी। वह कुछ खोज रही थी क्योंकि उसके जादू के कंकड़ खो गये थे और मिल नहीं रहे थे। मां को पूछ नहीं सकती थी। वह रो पड़ी। इंदु मंदिर की तरफ भागी। बूढ़ी मां को देखते ही उससे लिपट कर रोने लगी। उसने सारी बात बताई। बूढी मां हंसने लगी।
-मेरे कंकड़ गुम हो गए और आप हंस रही हैं। बूढ़ी मां ने मटके से और कंकड़ निकाले और कहने लगी, बेटी, ये सब सिर्फ सादे पत्थर हैं जादू के नहीं। तेरे में ही तीन गुण थे, लेकिन तू उसे पहचान नहीं पा रही थी। मैं ने इसी के सहारे उसकी पहचान करा दी। उसका लाभ तुझे हुआ।
यह सुनकर इंदु को हंसी आई। उसने पूछा, मतलब मैं ने यह सब मैंने अपनी हिम्मत पर किया है।
– बेटी, तुम्हारे भीतर ये गुण अभी भी हैं, वो खोए नहीं।
-थैंक्यू बूढ़ी मां कहकर वह घर लौट आई

-मच्छिंद्र ऐनापुरे (अनूदित कथा)

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