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चने की थैली

चने की थैली

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चीन के किसी गांव में बारिश अचानक जैसे मुसीबत ही लेकर आई। रात भर में ही पूरा गांव पानी से भर गया। सभी अपना सामान लेकर गांव से बाहर निकल गए। दूसरे दिन एक आदमी इवान ने पाया कि उसका कुछ सामान नहीं आया है। वह वापस उसी जगह गया अब तक पानी काफी भर गया था और घरों की छतें ही दिख रही थीं तभी उसकी नजर एक छत पर पड़ी जहां एक बौना सहायता के लिए चिल्ला रहा था। वह तैरकर गया और उसे कंधे पर लादकर ले आया।

बौने ने एक लंबा लबादा पहन रखा था उसने उसे सूखी जगह पर बिठाया और कुछ खाने को भी दिया। जब बौना चलने को हुआ तो धन्यवाद स्वरूप उसने एक थैली भर कर चना दिया और कहा इसे पूरी तरह खाली मत करना चार दाने जरूर रखना। अगले दिन यह फिर भर जाएगी। पानी उतर जाने के बाद इवान अपने गांव लौट आया। इवान का सिलसिला चल निकला थैली में से रोज मिलने वाले चनों को बेच कर वह अमीर हो गया। एक दिन उसे ख्याल आया कि बौने और उसके मित्रों को दावत पर बुलाना चाहिए। उसने एक कागज पर निमंत्रण लिखा और गांव के बाहर एक पेड़ पर टांग आया।

दिन भर दावत की तैयारियां चलती रहीं। घर के लोगों को विश्वास नहीं था कि वे आएंगे, पर वे आए। उन्होंने खुश होकर दावत का मजा लिया और चले गए। ऐसा हर साल होता रहा और दो पीढ़ियां गुजर गईं। चने की थैली रोज भरती रही और वे अमीर होते चले गए। तीसरी पीढ़ी आई तो परिवार के एक लड़के ने दावत देने से पहले सोचा कि ये बौने ऊपर से नीचे तक लबादा पहने रहते हैं इनके पैर कैसे होते होंगे…। उसने रास्ते में चूने की एक परत बिछा दी। बौने आए, दावत खाकर चुपचाप चले गए उन्होंने कुछ नहीं कहा। उनके जाने के बाद लड़के ने पांवों के निशान देखे तो वे बत्तखों के पंजों जैसे थे। वह हंस दिया-तो आज तक हम बत्तखों को खाना खिलाते रहे।
बौनों के पैर घायल हो गए थे उनसे खून रिस रहा था वे दुखी थे। उसी रात घर की एक नई आई बहू ने पूरी थैली खाली कर दी उसके बाद थैली फिर कभी नहीं भरी और बौने भी फिर कभी नहीं आए।

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