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उस रात के बाद…

उस रात के बाद…

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उस बिल्डिंग में रहने वाले लोग शहर में बहुत पॉपुलर थे, पर उनकी निजी जीवनशैली एकदम अलग थी। वे हमेशा वीकएंड नए तरह से बिताते… पिकनिक या शहर से बाहर आउटिंग। लंबी ड्राइव और लौट कर गर्म कॉफी के साथ कोई अच्छी मूवी देखना। क्रिसमस के दिनों में लॉन में क्रिसमस ट्री जगमगा उठता और गर्मियों में शाम को जब उस घर से गुलाम अली या जगजीत की गज़लों की धुन उठ कर हवा में तैर जाती तो आस-पास के रहने वालों को लगता कि वे उनके बीच के तो हैं, पर उनके जैसे नहीं हैं।
इस बार न तो बर्फ गिरने का मौसम था, न झील में बोटिंग करने का। वे इस बार बर्डवॉच के लिए भी नहीं गए थे, इसके बावजूद पूरे घर में सरगोशियां जारी थीं। तो फिर उस खूबसूरत सी बिल्डिंग में हो क्या रहा था…?
उनका परिवार काफी बड़ा था, पर आधे से ज्यादा लोग दूर के शहरों में या विदेश में रहते थे इसलिए अब परिवार सिमट कर रह गया था। घर का बड़ा बेटा अक्षय, उसकी पत्नी दीपाली, छोटा भाई सौरभ, अम्मा, घर की एकमात्र अविवाहित लड़की प्रियंवदा, नौकर जयराम और नौकरानी दमयंती। बस इतने से लोगों की यह दुनिया थी।
वह गर्मियों की रात थी …पूनम का चांद आसमान में रोशन था। गर्मी की वजह से भी और चांदनी का मजा लेने के लिए सभी के बिस्तर छत पर लगे। बस अम्मा अपने कमरे में नीचे ही रहीं। सौरभ के कुछ दोस्त भी आए हुए थे और लड़कों में बहस चल रही थी कि भूत-प्रेत और आत्माओं का कोई वजूद है या नहीं। बहस अब प्लेनचिट पर आ गई थी।

night-11क्या प्लेनचिट पर आत्माएं आती हैं ?
-इस तरह का प्रयोग करने के लिए काफी साहस और एकाग्रता की जरूरत पड़ती है और यह सब झूठ नहीं सच है …तापस ने धीमे से कहा।
-यह तुम कैसे कह सकते हो …सुखबीर ने तर्क किया।
-मैं काफी दिन बनारस में एक ऐसे आदमी के पास रहा हूं जो ऐसे प्रयोग करता था। कई बार प्लेनचिट पर प्रयोग के दौरान मैं उसका सहयोगी था।
-करके देखें …रणंजय उत्सुक था।
-रहने दो मजाक में कोई उल्टी-सीधी बात हो गई तो मुसीबत हो जाएगी। दीपाली परेशान हो गई।
-नहीं भाभी, तापस ऐसे प्रयोग कर चुका है, तो कोई डर नहीं। सौरभ ने कहा और कागज व स्केच पेन लेने चला गया।
चांदनी रात का सम्मोहन अपनी जगह था सबसे आखिरी बिस्तर पर लेटी प्रियंवदा दी खाली निगाहों से नदी की ओर देखे जा रही थीं। उन्होंने बड़ी कच्ची उम्र में किसी से प्यार किया था। उसकी मौत के बाद जैसे उनकी जिंदगी खाली होकर रह गई थी। हालांकि मौत स्वाभाविक ही थी, पर एक का मर जाना दूसरे को जीते जी मार गया था। शादी के सारे प्रस्तावों को नकार कर उन्होंने नौकरी कर ली थी और अब एकाकी जिंदगी को ही अपना मकसद बना लिया था।
खाना खाने के बाद सब ऊपर आ गए। अक्षय थके हुए थे, इसलिए अपने कमरे में सोने चले गए।
तापस ने सादे आर्ट पेपर पर जल्दी ही प्लेनचिट का खाका खींच दिया। चारों तरफ  अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर, दस तक के अंक और बीच में हां-नहीं के खाने भी। एक छोटी चौकी पर कागज रखा गया और बीच में एक बेहद हल्की छोटी सी कटोरी उलट कर रख दी गई।
-दीपाली भाभी आपको संजय भैया की याद है जिनकी लुधियाना में अचानक मौत हो गई थी और पता भी नहीं चला था क्या हुआ था।
-हां याद है.. दीपाली ने कहा ।
-तो आंखें बंद कर उनका चेहरा सामने ले आइए यही पूछ लेते हैं कि उनकी मौत कैसे हुई।
चारों खामोशी से बैठ गए और बीच में रखी कटोरी पर उंगली रख उन्होंने आंखें बंद कर लीं। पांच मिनट बाद जब उन्होंने आंखें खोलीं तो सारी लाइट्स गुल थीं… सिर्फ बाहर की हल्की रोशनी में कागज पर लिखे अक्षर चमक रहे थे।
-संजय भैया, हम आपको बुला रहे हैं आप यहां आइए… तापस का स्वर मानो किसी गहरे कुएं से निकल कर बाहर आया।
-प्लीज संजय भैया …दीपाली का स्नेह सिक्त स्वर था। वे सांस रोक कर कटोरी को देखते रहे और अचानक ही जैसे चमत्कार हो गया। कटोरी खिसकने लगी थी दीपाली का दिल धड़क उठा। तापस के चेहरे पर चमक थी बाकी लड़के स्तब्ध थे।
-आप आ गए …? तापस ने सवाल किया। कटोरी घूम कर हां पर चली गई।
-आपकी मौत कैसे हुई …क्या आपकी हत्या की गई थी ? इस बार भी कटोरी हां के खाने में चली गई।
-सुना है आपको जहर दिया गया था …क्या यह सच है ?
इस बार कटोरी के हां पर जाते ही सौरभ खिलखिला कर हंस पड़ा। जब सारे सवालों का जवाब हां में ही है तो पूछना क्या।
अचानक कटोरी चार्ट के बीच में आकर थम गई। अब वे सवाल पर सवाल करते जा रहे थे ,पर कटोरी में कोई हरकत नहीं थी। हार कर उन्होंने खेल खत्म करना चाहा।
-संजय भैया लौट जाइए …तापस ने कहा। कटोरी घूम कर, नहीं पर चली गई। तापस चौंका दीपाली सहित सभी के चेहरे का रंग उड़ गया।
-हमसे क्या गलती हुई…? आप वापस क्यों नहीं जाना चाहते। अब कटोरी ने चार्ट पर घूम कर जो शब्द बनाया वह टांटिंग था ।
-क्षमा, संजय भैया… तापस और दीपाली ने एक साथ कहा।
कटोरी वापस केंद्र में आ गई । अब उसमें कोई हरकत नहीं थी। आत्मा जा चुकी थी  उन्होंने राहत की सांस night13ली धड़कते दिल से सौरभ ने सामान समेटकर पढऩे के कमरे में छिपा दिया।
इसके बाद उन लोगों ने भूल कर भी प्लेनचिट की बात नहीं की और यह मामला वहीं खत्म हो गया।  इस घटना के तीसरे दिन प्रियंवदा दी दीपाली के पास आईं और अपने कमरे में ले गईं। वहां उसी तरह प्लेनचिट का इंतजाम था। उन्होंने दीपाली के सामने एक तस्वीर रख दी जिसमें एक युवक हॉफ स्वेटर पहने हुए खड़ा हंस रहा था। उसके सिल्की बाल धूप में चमक रहे थे।
-यह आदित्य है…उसके सामने बैठी प्रियंवदा दी की आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे। दीपाली और उन्होंने बीच में रखी कटोरी पर उंगली रखी
-आदित्य आओ ..तुम सुन रहे हो मेरी बात।
-हां आदित्य आ जाइए  दीपाली ने भी कहा। कटोरी में कंपन हुआ
-मुझे छोड़ कर क्यों गए…?
-मेरी उम्र इतनी ही थी।
-मैं फिर कभी बुलाना चाहूं तो आओगे?
-मैं इस कमरे से जाऊंगा ही नहीं। दीपाली के जैसे होश उड़ गए ।
-अभी आप जाइए आदित्य..हम फिर बुला लेंगे दीपाली ने कहा। कटोरी घूमकर सेंटर में चली गई। अब उसमें कोई स्पंदन न था। दीपाली ने निढाल पड़ी प्रियंवदा को बिस्तर पर सुला दिया और बाहर निकल आई। उस दिन के बाद उसने प्रियंवदा दी के चेहरे पर अक्सर दबी-दबी हंसी देखी। अब उनके कमरे से बांसुरी की ऐसी धुन क्यों सुनाई देती थी जिसमें दर्द नहीं प्यार था। तो क्या उस दिन आदित्य प्रियंवदा के पास ही रह गया था? लगता तो ऐसा ही था।

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