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सुप्रीम कोर्ट का अहम सवाल, इस्लाम में नमाज अनिवार्य नहीं तो हिजाब क्यों?

पैगंबर ने कहा था कि महिला का पर्दा उसके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है

सुप्रीम कोर्ट का अहम सवाल, इस्लाम में नमाज अनिवार्य नहीं तो हिजाब क्यों?

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सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक हिजाब (Hijab) विवाद मामले में सुनवाई का सिलसिला अभी खत्म नहीं हुआ है। कोर्ट ने गुरुवार को मुस्लिम पक्ष से पूछा कि जब इस्लाम में नमाज अनिवार्य नहीं है तो मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब कैसे अनिवार्य हो गया। वहीं, पीठ ने इस सवाल के लिए मुस्लिम पक्ष के ही तर्कों का हवाला दिया। उनके वकील ने कहा कि समुदाय के लिए इस्लाम के पांच प्रमुख सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य नहीं है। अब इस मामले में सोमवार को सुनवाई होगी।

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कर्नाटक हिजाब विवाद मामले पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और हेमंत गुप्ता की पीठ ने याचिकाकर्ता फातमा बुशरा के वकील मोहम्मद निजामुद्दीन पाशा से ये सवाल किया। जिस पर पाशा ने कोर्ट में तर्क देते हुए कहा कि इस्लाम में अपने अनुयायियों को इस्लाम (Islam) के पांच सिद्धांतों का पालन करने के लिए मजबूर करने की कोई बाध्यता नहीं है।

वहीं, इस पर पीठ ने पूछा कि अगर अस्थायी दंड से अभाव में मुसलमानों द्वारा इस्लाम के पांच सिद्धांतों नमाज, हज, रोजा, जकात और ईमान का अनिवार्य रूप से पालन नहीं किया जाता है तो हिजाब को मुस्लिम महिलाओं के लिए अनिवार्य कैसे कहा जा सकता है। इस पर पाशा ने कहा कि पैगंबर ने कहा था कि महिला का पर्दा उसके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। पाशा ने कहा कि कुरान पैगंबर के शब्दों का पालन करने के लिए कहता है। उन्होंने कहा कि एक मुस्लिम लड़की घर से बाहर निकलते समय हिजाब पहनने में विश्वास करती है। ऐसे में सरकार धर्म के आधार पर शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश में भेदभाव क्यों करती है।

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पाशा ने ये भी कहा कि सिख (Sikh) छात्र स्कूलों में पगड़ी पहनते हैं तो महिलाओं के हिजाब पहनने पर प्रतिबंध कैसे लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हिजाब पर प्रतिबंध लगाने का मतलब है कि एक ही धार्मिक समुदाय को निशाना बनाना। पीठ ने कहा कि सिख धर्म के पांच क को कानूनों और अदालतों द्वारा आवश्यक माना गया है। उन्होंने कहा कि पगड़ी से हिजाब की तुलना अनुचित है। इस पर पाशा ने कहा कि सिख धर्म के पाच क को आवश्यक किया गया हो सकता है, लेकिन पगड़ी को नहीं। उन्होंने कहा कि सिख धर्म सिर्फ 500 साल पुराना है, जबकि इस्लाम 1400 साल पुराना है। ऐसे में अगर 500 साल की धार्मिक प्रथा को शैक्षणिक संस्थानों में अनुमति है तो 1400 साल पुरानी प्रथा पर प्रतिबंध क्यों लगाया जा रहा है।

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