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संयम की असली परीक्षा अब

संयम की असली परीक्षा अब

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कही अनकही/अनल पत्रवाल। यदि आप खुद को जानते हैं और दुश्‍मन की फ़ितरत को भी, तो फिर चाहे सैकड़ों लड़ाइयां हों, नतीजों से डरने की जरूरत नहीं है। पाकिस्‍तान को संदेश तो दिया गया, लेकिन मुश्किल अब यहां से शुरू होती है। मोदी भारत की जरूरतों, संभावनाओं,उम्‍मीदों और चुनौतियों को भी जानते हैं साथ ही पाकिस्‍तान के मिजाज और उसके षड़यंत्र को भी। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ताजे सबक के बाद पाकिस्तान में आतंक की फैक्‍ट्री बंद हो जाएगी, बल्कि अब उसके दोगुनी ताकत से आगे आने का खतरा है। जैसा कि इन दिनों रोज एलओसी पर हो रहा है। आज भी एलओसी पर घुसपैठ की तीन नाकाम कोशिशें हुईं तो हंदवाड़ा के लंगेट में राष्ट्रीय राइफल्स के कैंप पर आतंकी हमला हुआ, जिसे सुरक्षाबलों ने नाकाम कर दिया। इस हमले में आतंकियों को मुंह की खानी पड़ी और दो आतंकी मार गिराए गए हैं। यानी अब हमारे संयम की असली परीक्षा शुरू हो चुकी है।

  • तनाव तक तो ठीक पर टकराव नहीं
  • अजेय होना है तो प्रतिरक्षा को मजबूत करना होगा

locजाहिर है कि मोदी बार-बार पाकिस्‍तान के खिलाफ यह नहीं करना चाहेंगे जो उन्‍हें इस बार करना पड़ा है, लेकिन पाकिस्तान अपने तौर-तरीके फिर नहीं आजमाएगा इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। यह भी सच्चाई है कि भारत, पाकिस्‍तान के साथ तनाव लेकर जी सकता है लेकिन टकराव लेकर नहीं। मोदी की कोशिश यही होगी कि वह संघर्ष को टालें और जल्‍द से जल्‍द सरकार के संवाद को पाकिस्‍तान की छाया से निकाल कर ग्रोथ, विकास और समृद्धि की तरफ लाएं। ऐसा न होने पर भारत को होने वाले नुकसान ज्‍यादा बडे़ होंगे। शायद हमें रणनीति के उस पुराने सिद्धांत की तरफ लौटना होगा जो कहता है कि हमले की स्थिति में जीत या हार दोनों संभावित हैं लेकिन यदि अजेय होना है तो प्रतिरक्षा   को मजबूत करना होगा।

  • पीएम नरेंद्र मोदी की जिम्मेदारी और बढ़ गई
  • देश के भीतर  राजनीतिक सहमति की जरूरत 

loc2पाकिस्तान के खिलाफ सख्त कार्रवाई के बाद अब पीएम नरेंद्र मोदी की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। वह, यह कि अब  उन्हें उदारता,सतर्कता और आक्रामकता का बेहद नाजुक संतुलन बनाना होगा। जाहिर है यह उनके लिए दोधारी तलवार पर चलने जैसा ही होगा क्योंकि इसके लिए उन्‍हें देश के भीतर  राजनीतिक सहमति की जरूरत होगी ताकि  अगले चुनावों में संघर्षहीन विजय हासिल हो सके। अभी तक की जो कार्रवाई हुई है उससे  सीधी तौर पर 2003 युद्ध विराम के उल्‍लंघन की घोषणा भी नहीं  की गई है और न ही इस कार्रवाई को आगे जारी रखने का  कोई संकेत है। यह सब कर मोदी ने बस घरेलू राजनीति में अपने संभावित  नुकसान को थाम लिया है और उस सियासी दबाव को भी हल्का कर लिया जो उड़ी हमले के बाद बना था।

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