चाय पीने वाले ना पीने वालों से ज्यादा लंबी जिंदगी जीते हैं

14 साल तक पांच लाख लोगों पर विज्ञानिकों ने किया अध्ययन

चाय पीने वाले ना पीने वालों से ज्यादा लंबी जिंदगी जीते हैं

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यूं तो चाय पीना (Having Tea) सेहत के लिए हानिकारक माना जाता है। मगर अगर हम सीमा के अंदर रहकर इसका इस्तेमाल करें तो यह खराब भी नहीं लगती है। अभी हाल ही में 14 साल तक पांच लाख लोगों ( Five million people) पर एक रिसर्च की गई। इसमें सामने आया कि जो लोग चाय पीते हैं वे चाय ना पीने वालों से ज्यादा जीवन जीते हैं। इस रिसर्च में चाय के स्वास्थ्यवर्धक गुणों के बारे में इस शोध से कई नई बातें सामने आई हैं। इस संबंध में नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (National Cancer Institute) के साइंटिस्टों ने एक विस्तृत अध्ययन किया है।

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इस रिसर्च में बड़े ही दिलचस्प नतीजे सामने आए हैं। साइंटिस्टों ने डेटाबेस आधार पर इस पर रिसर्च की है। इसमें आंकड़ों पर विश्लेषण किया गया है। इसमें पांच लाख से अधिक लोगों को शामिल किया गया और उनकी चाय पीने की आदत पर रिसर्च की गई। इस संबंध में ये आंकड़े इन लोगों से 14 साल तक बात करने के दौरान जुटाए गए थे। इस रिसर्च में साइंटिस्टों ने हेल्थ, सामाजिक और आर्थिक स्थिति, धूम्रपान, शराब, खान-पान, नस्ल और लिंग के आाधर पर निष्कर्षों पर अध्ययन किया गया।

tea

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इस रिसर्च में सामने आया कि जो लोग ज्यादा चाय पीते हैं उनके जीने संभावना ज्यादा लंबी होती है। चाय ना पीने वाले थोड़ा कम जी पाते हैं। यानी रोजाना दो या उससे ज्यादा कप चाय पीने वाले लोगों में मौत का खतरा दूसरे लोगों से 9.13 फीसद कम होता है। साइंटिस्टों (Scientists) ने यह भी बताया है कि चाय का तापमान, उसमें दूध या चीनी मिलाने के नतीजों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। चाय में ऐसे तत्व होते हैं जो क्षय को रोकते हैं।चीन और जापानए जहां ग्रीन टी सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैए वहां पहले भी ऐसे अध्ययन हो चुके हैं जिनमें चाय के स्वास्थ्यवर्धकगुण सामने आते रहे हैं। ब्रिटेन में सबसे ज्यादा लोकप्रिय काली चाय के बारे में एक अध्ययन हुआ है। यह अध्ययन अलैल्स ऑफ इंटरनल मेडिसिन नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने बताया कि हृदय रोगों का चाय से संबंध कुछ स्पष्ट हुआ लेकिन कैंसर की मौतों का चाय से कोई रिश्ता स्थापित नहीं हो पाया। हालांकि ऐसा क्यों हैए इस बारे में शोधकर्ता कोई ठोस जवाब नहीं खोज सके हैं। मुख्य शोधकर्ता माकी इनोऊ-चोई के मुताबिक हो सकता है कैंसर से कम मौतों के कारण कोई ठोस संबंध ना मिला हो।

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