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800 साल पुरानी बुद्ध के मूल दर्शन पद्धति से होगा दलाई लामा के पुनर्जन्म का चयन

800 साल पुरानी बुद्ध के मूल दर्शन पद्धति से होगा दलाई लामा के पुनर्जन्म का चयन

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धर्मशाला। दलाई लामा (Dalai Lama) के पुनर्जन्म का चयन तिब्बत बौद्ध धर्म की 800 साल पहले शुरू हुई बुद्ध के मूल दर्शन की पद्धति के अनुरूप है। दलाई लामा के अगले पुनर्जन्म के विषय में निर्णय का अधिकार पूरी तरह से दलाई लामा का है। किसी सरकार या अन्य के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं होगा। यदि राजनीतिक तौर पर पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार दलाई लामा के लिए उम्मीदवार चुनती है, तो तिब्बती लोग उस उम्मीदवार को पहचान नहीं पाएंगे और उसका सम्मान नहीं करेंगे। दलाई लामा के भविष्य के पुनर्जन्मों को मान्यता देने के तरीके के बारे में, एक ही अद्वितीय तिब्बती पारंपरिक विधि, जिसका अब तक लगातार उपयोग किया जा रहा है का पालन किया जाएगा।

 


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यह पद्धति बुद्ध के मूल दर्शन के अनुरूप है और 800 साल पहले तिब्बत में शुरू हुई थी। यह प्रस्ताव बुधवार को धर्मशाला में शुरू हुए तीन दिवसीय 14 वें तिब्बती धार्मिक सम्मेलन जिसका आयोजन केंद्रीय तिब्बती प्रशासन और धर्म,संस्कृति विभाग के संयुक्त तत्वाधान में किया जा रहा है में पारित किए गए। तिब्बती धार्मिक सम्मेलन में तिब्बत के चारों स्कूलों के प्रमुख सहित बॉन सम्प्रदाय के प्रमुख बौद्ध लामा उपस्थित रहे। वर्ष 1969 के बाद से दलाई लामा के पुनर्जन्म के बारे में पूछा गया, तब-तब दलाई लामा ने अंतर्राष्ट्रीय मीडिया को बताया कि यह तिब्बती लोगों द्वारा तय किया जाने वाला मामला है। वर्तमान में अब यह बड़ा मामला है, इसलिए तिब्बती लोगों के लिए दलाई लामा के पुनर्जन्म पर एक वैध रुख अपनाना महत्वपूर्ण है।

 


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दलाई लामा और तिब्बती लोगों के बीच संबंध सिर और गर्दन के बीच जैसा है। जैसा कि शरीर और उसकी छाया के बीच था इसलिए कभी अलग नहीं हुआ। इसलिए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि लगातार पुनर्जन्म के माध्यम से दलाई लामा के वंश की निरंतरता की परंपरा तिब्बती लोगों की खातिर बनी रहे। इस सम्मेलन के माध्यम से धार्मिक प्रमुखों और प्रतिनिधियों ने संकल्प पारित करते हुए कहा कि दलाई लामा और तिब्बती लोगों के बीच का कार्मिक बंधन अविभाज्य रहा है और तिब्बती लोगों की वर्तमान स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है, सभी तिब्बती वास्तव में भविष्य में दलाई लामा के संस्थान और पुनर्जन्म की निरंतरता की कामना करते हैं। इसलिए हम दलाई लामा के लिए दृढ़ता से उसी का समर्थन करते हैं।

पुनर्जन्म की पहचान किसी के पूर्व जीवन के बारे में जानकर वर्णन करने की व्यवस्था उस समय से थी जब स्वयं शाक्यमुनि बुद्ध जीवित थे। विनय वस्तु, जातक, विज्ञमूर्ख सूत्र और कर्मशतक इत्यादि अधिकतर सूत्र और तंत्र में कई विवरण मिलते हैं जिसमें तथागत द्वारा कर्मफल की व्यवस्था देते समय किस कर्म की संचय से आज इस फल का अनुभव किया जा रहा है, इसे विस्तार से दिखाया गया है। साथ ही भारतीय आचार्यों की जीवन कथाओं में जिनका जीवन बुद्ध के बाद था, कई अपने जन्म के पहले के स्थान को प्रकट करते हैं। ऐसी कई कहानियाँ हैं पर उनके पहचान और उनके अवतरण की संख्या की व्यवस्था भारत में नहीं हुई।

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