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पुरानी परंपरा को जिंदा रखने का नाम है चलती बहीर

पुरानी परंपरा को जिंदा रखने का नाम है चलती बहीर

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पुरानी परंपरा को जिंदा रखने का नाम है चलती बहीर

सचिन ओबरॉय/ पांवटा साहिब। आधुनिकता की दौड़ में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पुरानी परंपराओं को जिंदा रखने के लिए पीढ़ियों से प्रयास करते आ रहे हैं। ऐसी ही एक शक्शियत पंजाब के तरनतारन जिला के सुरसिंह साहिब नगरी के बाबा अवतार सिंह साहिब हैं। बाबा अवतार सिंह उस चलती बहीर के 12वें मुखिया हैं, जिसकी शुरुआत 17 वीं शताब्दी में सिखों के छठे गुरु श्री गुरु हर गोविंद के समय से शुरू हुई थी। बाबा अवतार सिंह की पिछली 11 पीढियां चलते बहीर परपंरा को निभा रहे हैं और इन्होंने भी अपना जीवन इसी परंपरा को समर्पित कर दिया है। आज कल बाबा अवतार सिंह के जत्थे के 60 घोड़े और 2 हाथी गुरु की नगरी पांवटा साहिब में आकर्षण का केंद्र बने हुए है। दरअसल बाबा अपने जत्थे के साथ सुरसिंह साहिब से पटना साहिब के लिए निकले है। जोकि हर वर्ष की तरह इस बार भी पांवटा में अपने घोड़ों की दौड़ व कर्तब दिखाएंगे।

17वीं सदी से जारी है परपंरा
गौर रहे कि चलता बहीर 17वीं सदी में मुगल कालीन समय की अनोखी परपंरा है। इसकी शुरुआत 10 वें गुरु श्री गोविंद सिंह के पटना साहिब से आनंदपुर साहिब के लिए चलने के समय हुई थी। इस दौरान श्री गुरु गोविंद सिंह ने मार्ग में कई लड़ाइयां लड़ी और सिख धर्म का प्रचार किया। इस दौरान उनके साथ सेवादारों, सिपाहियों, और रागियों के जत्थे चले। इस यात्रा को चलते बहीर का नाम दिया गया। चलते बहीर का जिम्मा श्री गुरु गोबिंद सिंह के दादा व छठे गुरु श्री हरगोविंद साहिब के प्रमुख सेवादार बाबा बिद्या चंद साहिब के वंशज करते रहे।


आज भी बाबा बिद्या चंद साहिब के वंशज इस परंपरा को उसी रूप से निभा रहे है। बाबा अवतार सिंह बाबा बिद्या चंद साहिब के वंश के 12 वें वंशज है और इनके बेटे ने भी पूर्वजों की इस परंपरा के निर्वाहन में जीवन समर्पित करने का फैसला किया है। बाबा अवतार सिंह साहिब कहते हैं कि यह परपंरा सिख धर्म के प्रचार और गुरु महाराज के संदेश को जन-जन तक पहुंचने के लिए हुए हैं। छठे गुरु द्वारा इनके पूर्वजों को हुक्म हुआ था कि सिख धर्म का प्रचार और जनता की सेवा करो। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज गुरु का हुक्म मानते आए है और आगे की पीढ़ियां भी निभाती रहेगी, जिसके तहत वे जगह-जगह जाकर सिक्ख धर्म के अनुयायीयों को अमृत छकाकर व धर्म के राह पर चलने के प्रेरणा देते हैं।

60 घोड़ें, दो हाथी और 500 सेवादारों का है जत्था

बाबा अवतार सिंह साहिब के चलते बहीर की संरचना आज भी वैसी ही है जैसे 17 वीं शताब्दी में थे बाबा के जत्थे में सुर सिंह साहिब नगरी से 60 घोड़े व 2 हाथी सहित प्राचीन परंपरागत हथियार, श्री गुरु ग्रंथ साहब व लंगर का सारा सामान लगभग 500 सेवादारों के साथ पटना साहिब के लिए चला है। चलते बहीर की एक विशेषता यह भी है यह है जिस स्थान पर रात्रि ठहराव करते हैं, वहां अपने तंबुओं में सोते हैं अपने परंपरागत बर्तनों में लंगर बनाने वाले सेवादारों को विवेकी सेवादार कहा जाता है। बाबा अवतार सिंह साहिब के जत्थे में शामिल हर सेवादार परंपरागत सिख वेशभूषा को अपनाता है। गुरु की नगरी पांवटा साहिब में चलते बहीर का यह पड़ाव लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

स्थानीय लोग इन स्वस्थ व सुंदर घोड़ों व हाथियों को देखने के लिए भी उमड़ रहे हैं। बाबा के जत्थे में शामिल सेवादार जरनैल सिंह ने बताया की चलते बहीर जत्था 1 दिसंबर को पंजाब के तरनतारन जिला के सुर सिंह साहिब नगरी से पटना साहिब के लिए चला है। पांवटा साहिब में श्री गुरु गोविंद सिंह के 52 कवियों की याद में उन्होंने विशेष अखंड पाठ साहिब का आयोजन किया है। उन्होंने बताया कि सभी 60 घोड़े दो हाथी सहित 500 सेवादारों का विशाल जत्था सड़क मार्ग से पटना साहिब पहुंचेगा। जहां श्री गुरु गोबिंद सिंह के साढ़े 3 सौ साला कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे।

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