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दुर्लभ स्यमंतक मणि

दुर्लभ स्यमंतक मणि

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सत्राजित भगवान सूर्य का बहुत बड़ा भक्त था। सूर्य भगवान ने ही प्रसन्न होकर बड़े प्रेम से उसे स्यमंतक मणि दी थी। सत्राजित उस मणि को गले में धारण कर ऐसा चमकने लगा, मानो स्वयं सूर्य ही हो। जब सत्राजित द्वारका आया, तब अत्यन्त तेजस्विता के कारण लोग उसे पहचान न सके। दूर से ही उसे देखकर लोगों की आंखें उसके तेज से चौंधिया गईं। लोगों ने समझा कि कदाचित स्वयं भगवान सूर्य आ रहे हैं। उन लोगों ने भगवान के पास आकर उन्हें इस बात की सूचना दी। उस समय भगवान चौसर खेल रहे थे। लोगों ने कहाः ‘शंख-चक्र-गदाधारी नारायण ! कमलनयन दामोदर ! यदुवंशशिरोमणि गोविन्द ! आपको नमस्कार है। जगदीश्वर देखिये, अपनी चमकीली किरणों से लोगों के नेत्रों को चौंधियाते हुए प्रचण्डरश्मि भगवान सूर्य आपके दर्शनों को आ रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण हंसने लगे। उन्होंने कहा- ‘अरे, ये सूर्यदेव नहीं है। यह तो सत्राजित है, जो मणि के कारण इतना चमक रहा है। घर पर उसके शुभागमन के उपलक्ष्य में मंगल-उत्सव मनाया जा रहा था। उसने ब्राह्मणों द्वारा स्यमंतक मणि को एक देवमन्दिर में स्थापित करा दिया। वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना दिया करती थी और जहां वह पूजित होकर रहती थी, वहां दुर्भिक्ष, महामारी, ग्रहपीड़ा, सर्पभय, मानसिक और शारीरिक व्यथा तथा मायावियों का उपद्रव आदि कोई भी अशुभ नहीं होता था। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसंगवश कहा कि सत्राजित ! तुम अपनी मणि राजा उग्रसेन को दे दो परन्तु उसने अस्वीकार कर दिया।

maniएक दिन सत्राजित के भाई प्रसेन ने उस परम प्रकाशमयी मणि को अपने गले में धारण कर लिया और फिर वह घोड़े पर सवार होकर शिकार खेलने वन में चला गया। वहां एक सिंह ने घोड़े सहित प्रसेन को मार डाला और उस मणि को छीन लिया। वह अभी पर्वत की गुफा में प्रवेश कर ही रहा था कि मणि के लिए ऋक्षराज जाम्बवान् ने उसे मार डाला। उन्होंने वह मणि अपनी गुफा में ले जाकर बच्चे को खेलने के लिए दे दी। अपने भाई प्रसेन के न लौटने से उसके भाई सत्राजित को बड़ा दुःख हुआ। वह कहने लगा कि बहुत सम्भव है श्रीकृष्ण ने ही मेरे भाई को मार डाला हो, क्योंकि वह मणि गले में डालकर वन में गया था। सत्राजित की यह बात सुनकर लोग आपस में काना-फूसी करने लगे। जब भगवान श्रीकृष्ण नगर के कुछ सभ्य पुरुषों को साथ लेकर प्रसेन को ढूंढने के लिए वन में गये। वहां लोगों ने देखा कि घोर जंगल में सिंह ने प्रसेन और उसके घोड़े को मार डाला है। जब वे लोग सिंह के पैरों का चिन्ह देखते हुए आगे बढ़े, तब उन लोगों ने यह भी देखा कि पर्वत पर रीछ ने सिंह को भी मार डाला है।
भगवान श्रीकृष्ण ने सब लोगों को बाहर ही बिठा दिया और अकेले ही घोर अन्धकार से भरी हुई ऋक्षराज की भयंकर गुफा में प्रवेश किया। भगवान ने वहां जाकर देखा कि श्रेष्ठ मणि स्यमन्तक को बच्चों का खिलौना बना दिया गया है। वे उसे लेने की इच्छा से बच्चे के पास जा खड़े हुए। उस गुफा में एक अपरिचित मनुष्य को देखकर बच्चे की धाय भयभीत हो चिल्ला उठी। उसकी चिल्लाहट सुन ऋक्षराज जाम्बवान क्रोधित होकर वहां दौड़ आये। परीक्षित ! उन्हें भगवान की महिमा का पता न चला। उन्होंने एक साधारण मनुष्य समझ लिया और वे भगवान श्रीकृष्ण से युद्ध करने लगे। वज्र-प्रहार के समान कठोर घूंसों की चोट से जाम्बवान के शरीर की एक-एक गांठ टूट गयी। उत्साह जाता रहा। शरीर पसीने से लथपथ हो गया तब उन्होंने अत्यंत विस्मित-चकित होकर भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि प्रभो ! मैं जान गया। आप ही समस्त प्राणियों के स्वामी, रक्षक भगवान विष्णु हैं।

mani4श्रीकृष्ण ने अपने परम कल्याणकारी शीतल करकमल को उनके शरीर पर फेर दिया और प्रेम गम्भीर वाणी से अपने भक्त जाम्बवान से कहा कि ऋक्षराज ! हम मणि के लिए ही तुम्हारी इस गुफा में आये हैं। इस मणि के द्वारा मैं अपने पर लगे झूठे कलंक को मिटाना चाहता हूं। भगवान के ऐसा कहने पर जाम्बवान बड़े आनन्द से उनकी पूजा करने के लिए अपनी कन्या कुमारी जाम्बवंती को मणि के साथ उनके चरणों में समर्पित कर दिया।
भगवान श्रीकृष्ण जिन लोगों को गुफा के बाहर छोड़ गये थे, उन्होंने बारह दिन तक उनकी प्रतीक्षा की परन्तु जब उन्होंने देखा कि अब तक वे गुफा से नहीं निकले, तब वे अत्यंत दुःखी होकर द्वारका लौट गये। वहां जब माता देवकी, रूकमणि, वसुदेव जी तथा अन्य संबन्धियों और कुटुम्बियों को यह मालूम हुआ कि श्रीकृष्ण गुफा से नहीं निकले, तब उन्हें बड़ा शोक हुआ। सभी द्वारकावासी अत्यंत दुःखी होकर सत्राजित को भला बुरा कहने लगे। उसी समय उनके बीच में मणि और अपनी नववधू जाम्बवंती के साथ श्रीकृष्ण प्रकट हो गए।
भगवान ने सत्राजित को राजसभा में महाराज उग्रसेन के पास बुलवाया और जिस प्रकार मणि प्राप्त हुई थी, वह सब कथा सुनाकर उन्होंने वह मणि सत्राजित को सौंप दी। सत्राजित अत्यंत लज्जित हो गया। मणि तो उसने ले ली, परन्तु अपने अपराध पर उसे बड़ा पश्चाताप हो रहा था। उसने सोचा अब मैं रमणियों में रत्न के समान अपनी कन्या सत्यभामा और वह स्यमंतक मणि दोनों ही श्रीकृष्ण को दूं तो ही मेरे अपराध का मार्जन हो सकता है। सत्राजित ने अपनी कन्या तथा स्यमन्तक मणि दोनों ही ले जाकर श्रीकृष्ण को अर्पण कर दीं। भगवान श्रीकृष्ण ने विधिपूर्वक उनका पाणिग्रहण किया।

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