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मरने के बीस दिन बाद भी वो “जिंदा” हैं, चेहरे की चमक-शरीर की गर्माहट बराबर बनी

दक्षिण भारत में गादेन जंग्त्से मठ के बौद्ध विद्वान गेशे तेनपा चिकित्सकीय रूप से मृत घोषित

मरने के बीस दिन बाद भी वो “जिंदा” हैं, चेहरे की चमक-शरीर की गर्माहट बराबर बनी

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मैक्लोडगंज। मरने के बीस दिन बाद भी कोई जिंदा हो सकता है, सुनने भर में ही अटपटा सा लगता है, लेकिन ऐसा हुआ है। जिस शख्स को बीस दिन पहले चिकित्सकीय रूप से मृत (Clinically Dead) घोषित कर दिया गया हो उसके चेहरे की चमक (Glow on their Face) व शरीर की गर्माहट इस बात का हल्का सा भी आभास नहीं होने देती कि वह मृत शरीर है। बात कर रहे हैं, दक्षिण भारत में गादेन जंग्त्से मठ (Gaden Jangtse Monastery in South India) के बौद्ध विद्वान गेशे तेनपा ग्यालत्सेन (Geshe Tenpa Gyaltsen) की। उनकी मृत्यु को हुए बीस दिन बीत चुके हैं, लेकिन उनके शरीर से आज भी कोई शारीरिक क्षय या कमी के संकेत नहीं मिले हैं। यानी चिकित्सीय तौर पर मृत्यु के 20 दिनों के बाद भी गेशे तेनपा थुकदाम की दुर्लभ ध्यानस्थ अवस्था में हैं।


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तिब्बती बौद्धों ने थुकदाम के दुर्लभ ध्यान के रूप में वर्णन किया है। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) के धर्म और संस्कृति विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक थुकदाम एक बौद्ध घटना है जिसमें एहसास होता है कि शारीरिक मृत्यु के बावजूद मरने वाले की चेतना बनी रहती है। यद्यपि उन्हें चिकित्सकीय रूप से मृत घोषित कर दिया जाता है, लेकिन उनके शरीर में क्षय के कोई लक्षण नहीं दिखते हैं और यह बिना संरक्षण के दिनों या हफ्तों तक ताज़ा बने रहते हैं। तिब्बती बौद्ध साहित्य के अनुसार, उनके चेहरे पर एक निश्चित चमक है और एक सामान्य जीवित व्यक्ति के रूप में उनके शरीर में एक गर्माहट है। थुकदाम (Thukdam) एक तिब्बती शब्द है जिसका अर्थ है है मन और बांध, समाधि (Samadhi) या ध्यान की स्थिति के लिए खड़े रहना। तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा (The Dalai Lama) की पहल पर कुछ वर्षों पहले इस तरह की घटना की वैज्ञानिक जांच चल रही है।


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गेशे तेनपा ग्यालत्सेन का जन्म 23 अप्रैल 1934 को खाम तावो में, मां लोबसांग ल्हामो और पिता लोबसांग बुमराम के घर हुआ था। 20 साल की उम्र में, वह तिब्बत स्थित गाडेन जंग्त्से मठ में शामिल हो गए। वर्ष1959 में, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (Chinese Communist Party) द्वारा तिब्बत पर अवैध कब्जे के बाद वह दसियों हज़ार लोगों के साथ भारत आ गए। गेशे ने शुरुआती वर्ष बक्सर (Buxar Choegar) स्थित धर्म केंद्र में बिताए, जोकि 1959 में तिब्बतियों (Tibetans) के लिए स्थापित पहली मठ सुविधा थी। बाद में वे दक्षिण भारत चले गए। गेशे एक अच्छी तरह से सीखे हुए बौद्ध चिकित्सक थे और उन्होंने तिब्बती बौद्ध धर्म के प्रमुख कैनन का अध्ययन करने में वर्षों बिताए थे।

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